इस तपती गर्मी में चील गर्म धूल में क्यों लोट रही है?

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कुमार नरेंद्र सिंह

: घाघ को ऐसे मिली थी प्रेमिका : मेरी नजर में भारत ने केवल एक ही ऐसा व्यक्ति पैदा किया है, जो एक साथ मौसम, कृषि औऱ पशु वैज्ञानिक था। उसका नाम घाघ था। प्राप्त जानकारी के अनुसार घाघ उन्नाव के रहनेवाले थे, जहां आज भी घाघ का पुरवा नामक एक गांव है। घाघ को बचपन से ही मौसम के बदलते मिजाज परखने में रुचि थी। वह मौसम, कृषि और पशु के अन्तरसंबंधों का अध्ययन करने में लगे रहते थे। अन्यथा नहीं कि वह यह बताने में कामयाब रहे कि वर्षा के क्या लक्षण हैं, किस तरह के मौसम में कौन सा अन्न-सब्जी बोना चाहिए, उसकी गुड़ाई कैसे की जानी चाहिए और किस तरह का बैल किसान के लिए उपयोगी होगा। लेकिन ये सब बातें बाद में। आज मैं केवल घाघ और उनकी प्रेमिका, जो बाद में उनकी पत्नी भी बनी की पहली मुलाकात की कहानी सुनाउंगा।

तब घाघ जवानी की दहलीज पर कदम रख चुके थे। पिता उनकी शादी जल्द से जल्द कर देना चाहते थे, क्योंकि उस वक्त यही रवायत थी। लेकिन घाघ को मौसम से प्यार हो गया था। वह हमेशा उसकी रंगत देखने और पहचानने में लगे रहते थे। एक दिन घाघ जेठ की तपती दोपहरी में मौसम के बारे में अध्ययन करने निकले थे। सूरज आग बरसा रहा था। हवा तो चल रही थी, लेकिन ताप से तप्त होकर और भी कहर ढा रही थी। घाघ गर्मी से बेहाल थे। पसीने से सराबोर वह किसी छाया की खोज कर रहे थे ताकि थोड़ा सुस्ता लें।

गर्मी इतनी थी, जैसे चारों तरफ आग लगी हुयी हो। वह चलते रहे। चलते-चलते कुछ दूरी पर उन्हें आम के कुछ पेड़ दिखायी पड़े। वह उसी और तेजी से बढ़ चले। पेड़ के पास पहुंच कर वह जल्दी ही एक आम के पेड़ के नीचे बैठ गए और आराम करने लगे। पेड़ के नीचे उन्हें थोड़ी राहत मिली औऱ जो हवा अब तक उनका तन जला रही थी, वह अब कुछ हद तक शीतलता देने लगी। उन्हें वहां इतना आराम मिला कि उन्हें नींद आने लगी, आंखें मुंदने-सी लगी।
तभी उनके कानों में अस्फुट से स्वर सुनायी दिए।

पहले तो उन्हें लगा कि शायद पेड़ों के पत्ते की सरसराहट है। लेकिन वह स्वर अब और थोड़ा स्पष्ट होने लगा था, लेकिन इतना नहीं कि वह समझ पाते कि यह स्वर कैसा है। थोड़ी देर और बैठने के बाद स्वर औऱ भी स्पष्ट हुआ। उन्हें लगा जैसे कोई बात कर रहा हो। अब वह चौकन्ने हो उठे। आखिर इस भरी दोपहरी में यहां माह-मैदान में कौन हो सकता है, उन्होंने सोचा। उनकी उत्सुकता बढ़ने लगी और वह यह देखने को बेताब हो उठे कि यह आवाज कहां से आ रही है। लेकिन वहां उन्हें कोई दिखायी नहीं दिया। एकांत में उन्हें डर भी महसूस हुआ, लेकिन इसके बावजूद वह अपने स्थान उठकर आवाज का स्रोत ढूंढ़ने लगे।

अचानक उन्होंने देखा कि कुछ दूर एक दूसरे आम के पेड़ के नीचे एक युवती बैठी है। घाघ उसकी तरफ चलने लगे औऱ उस पेड़ के पास जा पहुंचे, जहां वह युवती बैठी हुयी थी। देखने में किसी अपसरा-सी सुंदर थी, लेकिन वह न जाने कहां खोयी हुयी थी कि उसे घाघ के आने का पता तक नहीं चला। घाघ ने देखा कि वह लड़की अपनी आंखें मूंदे हुयी है और धीरे-धीरे कुछ बोले जा रही है। घाघ चुपचाप उसकी बात सुनने का प्रयत्न करने लगे। इसी बाच युवती ने आपनी आंखें खोलीं और सामने देखने लगी।

युवती के आंखें खोलते देख पहले तो वह असहज हो उठे, लेकिन तब उन्हें बड़ा अचरज हुआ जब उन्होंने देखा कि यह युवती उनकी उपस्थिति का कोई संज्ञान ही नहीं ले रही है। थोड़ी देर तक तो वह उस रुपसी को निहारते रहे और यह जानने की कोशिश करते रहे कि क्या वह युवती भी उन्हें उसी तरह देख रही है, जैसे वह उसे देख रहे थे। उन्हें लगा कि यह युवती तो कहीं शून्य में देख रही है, लेकिन जल्दी ही उन्हें आभास हो गया कि युवती नेत्रहीन है। अब वह थोड़ा और नजदीक आकर उसकी बातें सुनने का प्रयत्न करने लगे।

वह युवती बोल रही थी — बरखा हो क्यों नहीं रही है। अब तक तो बरस जाना चाहिए था। दो घंटे हो गये यहां बैठे। मेरी बकरियां भी पता नहीं कहां चली गयी हैं। ऐसा तो कभी नहीं हुआ कि मैं बरखा का इंतजार करूं और वह इतनी देर तक न बरखे। घाघ बड़ी तन्मयता से उसकी बातें सुन रहे थे, लेकिन उन्हें महसूस हुआ कि ऐसी बातें तो कोई पागल ही कर सकता है। उसकी बातें सुनकर घाघ को अब हंसी आ रही थी, लेकिन इस आशंका से नहीं हंसे कि युवती को बुरा लग सकता है। जब चुप रहना मुश्किल हो गया, तो उन्होंने मजाकिया लहजे में युवती से कहा – अंधी तो लग रही हो, पागल भी हो क्या।

किसी पुरुष का स्वर सुनते ही युवती चौंकन्नी हो उठी और उसने अपने डंडे से उस ओर प्रहार किया, जिस ओर से आवाज आयी थी। घाघ को डंडा तो नहीं लगा, लेकिन उसके बाद युवती ने जो कहा, उसे सुनकर घाघ को एहसास हो गया कि युवती नेत्रहीन भले हो, पागल तो कतई नहीं है। युवती ने कहा – पहले तुम यह बताओ कि तुम्हें क्यों लगा कि मैं पागल हूं। घाघ ने कहा कि तुम कह रही थी कि बारिश अब तक हुयी क्यों नहीं, अब तक तो बर्षा शुरू हो जानी चाहिए थी। अब इस तपती दुपहरी में, जब पछुआ ललकार रहा हो, तो वर्षा होने की बात करने वाला तो कोई पागल ही हो सकता है। मुझे तो वर्षा का कोई लक्षण नहीं दिखायी दे रहा है।

अब तुम बताओ कि तुम्हें वर्षा की संभावना कहां दिखायी दे रही है। युवती ने घाघ से कहा कि पहले तुम बताओ कि अभी वर्षा क्यों नहीं होगी। घाघ ने पहले तो उसे टरकाना चाहा, क्योंकि उनकी नजर में वह युवती इस काबिल नहीं थी कि उससे मौसम के बारे में तर्क-वितर्क किया जाए, लेकिन युवती के बार-बार पूछने पर उन्होंने कहा – मेरी नजर में फिलहाल वर्षा होने की कोई संभावना नहीं है, क्योंकि एक तो सूरज लंबवत चमक रहा है, दूसरा कि पछिया हवा चल रही है और तीसरा कि हवा में नमी नहीं है, क्योंकि यदि हवा में नमी होती, तो मेरा पसीना इतनी जल्दी नहीं सूखता।

घाघ अभी कुछ और कहने ही जा रहे थे कि युवती की बकरियां में..में करती उसके पास आने लगीं थीं। युवती के होंठों पर मंद-मंद मुस्कान उभर आयी। उसने घाघ से कहा – इसमें कोई शक नहीं कि वर्षा से संबंधित तुम्हारी जानकारी बहुत अच्छी है, वर्षा नहीं होने के जो तुमने लक्षण बताए, उसमें कोई खोट नहीं है, लेकिन अफसोस कि तुम्हें केवल निर्जीव वस्तुओं का ही ज्ञान है। अब चौंकने की बारी घाघ की थी। अब उन्हें ‘पगली’ की बातों का मतलब समझ में आने लगा था। अब उनके चेहरे से युवती का मजाक उड़ाने का भाव गायब था और गंभीर हो चले।

घाघ ने तब युवती से पूछा – अब तुम बताओ कि तुम बारिश की संभावना कैसे देख रही हो? पहले तो युवती आनाकानी करती रही, लेकिन घाघ के अतिशय आग्रह पर उसने कहना शुरू किया – सबसे पहले कि जिसे तुम पछिया हवा बता रहे हो, वह पछिया हवा है ही नहीं। मैं यह नहीं कहती कि तुम्हें दिशा या हवा का ज्ञान नहीं है, लेकिन पेड़ के नीचे तुम्हें जो हवा लग रही थी, वह पछिया नहीं, बल्कि चौपायी हवा थी। तुम्हें जो हवा लग रही थी, वह तुम्हारे बगल के पेड़ से टकरा कर लग रही थी। तुम तो जानते भी होगे कि चौपायी हवा चलने का बारिश से क्या संबंध है।

दूसरी बात कि मेरे पांव पर चिट्टियां चढ़ रही हैं। वास्तव में वे वर्षा से होनेवाली तकलीफ से बचने के लिए किसी ऊंचे स्थान पर जाना चाहती हैं। देखो ना, उनके मुंह में उनके अण्डे भी होंगे। घाघ ने देखा कि युवती सही कह रही है। युवती ने आगे कहना शुरू किया – तुमने धूप, हवा, सूरज आदि का ठीक-ठाक ही अध्ययन किया है, लेकिन जरा यह तो बताओ कि इस तपती गर्मी में चील गर्म धूल में क्यों लोट रही है। क्या उनकी चींचीं की कर्कश आवाज सुनायी नहीं दे रही। और तो छोड़ो, तुमने देखा नहीं कि मेरी बकरियां में..में..में..में करती मेरी ओर दौड़ी आ रही हैं।

इतना जान लेने के बाद मुझे सूरज को, गर्मी को और हवा के बारे में क्यों सोचना चाहिए कि वे वर्षा के लक्षण बताएंगे। इधर घाघ युवती के आगे अपने को मूर्ख पा रहे थे। उन्हें लग रहा था कि वर्षों का मौसम संबंधी उनका अध्ययन इस नेत्रहीन युवती के सजीव ज्ञान के आगे सतही है। युवती के सहज ज्ञान के आगे वे पराजित खड़े थे। कुछ सूझ नहीं रहा था। अचनाक वह स्थिर हो गए और थोड़ी देर उसी गंभीर मुद्रा में रहने के बाद जब चैतन्य हुए, तो उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था, जैसे वह किसी निर्णय पर पहुंच गए हों। उनके चेहरे पर शांति और प्रसन्नता के भाव खिल रहे थे। उन्होंने उस युवती से सीधे कहा – क्या तुम मेरे साथ घर बसाओगी?kumar

कुमार नरेंद्र सिंह वरिष्‍ठ एवं देश के जानेमाने पत्रकार हैं। हिंदी, अंग्रेजी और भोजपुरी भाषा पर समान पकड़ रखने वाले श्री सिंह कई किताबें भी लिख चुके हैं। वह राष्‍ट्रीय सहारा, हमार टीवी, नई दुनिया समेत कई संस्‍थानों में वरिष्‍ठ पद पर काम कर चुके हैं। फिलहाल वह पाक्षिक पत्रिका लोक स्‍वामी के संपादक के तौर पर काम कर रहे हैं।