…क्‍यों अजीत अंजुम ने इस ‘नाग’ पत्रकार को दूध पिलाने की पर्ची चिपकायी?  

: उस जमाने में अपने संपर्कों की वजह से फन्ने खां टाइप समझते थे : फेसबुक पर कुछ लोगों की पोस्ट से पता चला कि आज नागपंचमी है तो इसी से मुझे अपनी कुछ शरारतें याद आई. सोचा आज अपने गुनाह भी कबूल कर लूं और माफी भी मांग लूं. ये बात 91/92 की है. अमर उजाला के दिल्ली ब्यूरो में मैं रिपोर्टर था. INS बिल्डिंग में हमारा दफ्तर हुआ करता था. प्रबाल मैत्र ब्यूरो चीफ थे. अरविंद कुमार सिंह और  अतुल सिन्‍हा साथी रिपोर्टर.

उन दिनों आईएनएस के ही नवभारत ब्यूरो में एक ब्यूरो चीफ हुआ करते थे – राजीव रंजन ‘नाग’. उस जमाने के बड़े रिपोर्टर थे, जब हम चहबच्चे थे. किसी बात को लेकर मेरे मन में उनके लिए एक फ़ांस थी, जो उन्हें देखते थी जागृत हो जाती थी. सामने से रोज गुजरते लेकिन एक दूसरे को ‘पहचाने’ बगैर. वो अपने को उस जमाने में अपने संपर्कों की वजह से फन्ने खां टाइप समझते थे और जवानी के जोश में हम ऐसे फन्नेखाओं को कुछ समझते नहीं थे. हमारे उनके बीच केमिकल लोचा वाला रिश्ता पहली मुलाकात में ही बन गया था.

हुआ यूं था कि हम पटना से एक अदद नौकरी की तलाश में दिल्ली आ गिरे थे. पटना के कुछ वरिष्ठों ने नाग साहब को दिल्ली की पत्रकारिता का बड़ा आदमी घोषित करते हुए मिलने की सलाह दी थी. अगर मुझे ठीक से याद है तो किसी ने उनसे मिलने के लिए रुक्केनुमा एक पर्ची भी दी थी. मैं जब आईएनएस के उनके दफ्तर में दाखिल हुआ तो ये मानकर हुआ था कि वो कुछ मदद करें न करें, पटना के होने की वजह से बात तो ठीक से कर ही लेंगे. नाग साहब ने तो कुछ और ही नजारा दिखा दिया.

आरामदेह रिवॉल्विंग कुर्सी पर बैठे-बैठे पहले तो अपने अंदाज से हमें बेअन्दाज कर दिया. क्यों दिल्ली आ गए तुम? यहाँ नौकरी नहीं मिलती. ऐसे थोड़े होता है कि सीधे चले आये टाइप सवालनुमा नसीहत भी दी और मजाक भी उड़ाया. उनके चेहरे का भाव एक दंभी लाला जैसी थी और ऐसे बात कर रहे थे जैसे मैं उनके किराने की दुकान में नौकरी मांगने पहुंच गया था. अपने अंदाज में छोटे छोटे लेकिन चुभते वाक्यों के टुकड़े मेरी ओर फेंक रहे थे और मैं अपने वहाँ जाने पर मन ही मन अफसोस कर रहा था.

कुल 3-4 मिनट की अप्रिय मुलाकात के बाद मैंने कुछ टका सा जवाब दिया और बाहर आ गया. तय किया कि अब इस आदमी से कभी बात भी नहीं करूंगा. मैं गुवाहाटी से एक सीमेंट कारोबारी लाला के ‘गर्भस्थ अख़बार’ की नौकरी महीने भर में छोड़कर ताज़ा-ताज़ा दिल्ली आया था, लिहाज़ा तेवर और तैश का स्टॉक बचा हुआ था.

खैर, मुझे पहले चौथी दुनिया फिर अमर उजाला में नौकरी मिल गयी. आईएनएस में दफ्तर और ठिकाना मिल गया. शहर बेगूसराय में लगभग नालायक घोषित हो चुके अपने बेटे को नौकरी मिलने की खुशी में बाबूजी ने उस जमाने में हीरो होंडा फटफटिया खरीदकर भेज दिया. एक रिपोर्टर के नाते संसद से लेकर सत्ताधारी दलों के मुख्यालयों तक जाने लगा. अपने नाम के साथ अखबार के पहले पन्ने पर खबरें छपने लगी.

फिर क्या था,  बेरोजगार से स्टाफ रिपोर्टर बने इस युवा का कॉलर ऊंचा हो गया. अब जब भी नाग साहब आते-जाते सामने पड़ते, अपने आप शरीर थोड़ा ऐंठ जाता. चेहरे पर हिकारत का भाव आ जाता. आप कौन? वाला अंदाज लिए बगल से गुजर जाता. उसी दौरान मुझे दो-तीन लोगों ने मेरे बारे में उनके कुछ और बयान बताकर भड़का दिया.

इसी बीच नागपंचमी का त्योहार आ गया. पता नहीं मुझे क्या सूझा कि मैंने कहीं से नाग की तस्वीर काट कर निकाली. उसकी फ़ोटोकॉपी निकाली. उसपर नाग पंचमी मुबारक हो, आज आप सब लोग फलां कमरा नंबर में जाकर नाग को दूध पिलाएं लिखकर लिफ्ट में चिपका दिया. कुछ मिनटों के अंतराल पर जाकर चेक भी कर रहा था कि किसी ने फाड़ा तो नहीं. मैं चाहता था कि नाग साहब के साथ साथ औरों को पता चले कि कोई उनसे मजे ले रहा है.

तभी पता चला कि किसी ने फाड़ दिया है. मैंने इस बार वैसी दस कॉपी बनाकर हर फ्लोर पर लिफ्ट के बाहर और भीतर चिपका दिया. फाड़ो कहाँ-कहाँ फाड़ोगे टाइप. फिर सीट पर आकर बैठ गया. दफ्तर में मेरे दोनों सहयोगियों को पता था कि मैं क्या कर रहा हूँ. हम सब ठहाके लगा रहे और बाहर जा जाकर देख रहे थे कि नाग साहब आये या नहीं.

शाम तक आईएनएस के नीचे संजय चाय वाले के पास कई लोग नाग को दूध पिलाने वाले इस पर्चे की चर्चा कर रहे थे और हम आनन्दित हो रहे थे. बाद के सालों में ही हमारी कभी हेलो-हाय नहीं हुई. हाल में बेगूसराय के एक सेमिनार के मंच पर हम साथ थे तो 26 साल बाद पहली बार एक दूसरे से टोका-टाकी हुई और मेरे भीतर जमी सारी बर्फ सब एक झटके में पिघल गई. आज अपनी बदमाशी कबूल करते हुए नाग साहब से 26 साल पहले की शरारत के लिए माफी मांगता हूं.

वरिष्‍ठ पत्रकार अजीत अंजुम के एफबी वाल से साभार.