मजदूरों का भविष्‍य नहीं होता, क्‍योंकि वे भाग्‍य से बाहर नहीं देख पाते

labour

नवल किशोर

  • गांव वापस आने से इनमें चेतना आई है!
  • मजदूर संगठन विभिन्न राजनीतिक दलों की कठपुतली हैं!

कार्ल मार्क्स द्वारा श्रम और पूंजी का विश्लेषण जब किया गया, उस समय श्रमिकों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। तभी “कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो” और “दास कैपिटल” जैसी दार्शनिक पुस्तकें कार्ल मार्क्स द्वारा लिखी गई, जिसमें दमन, शोषण और उत्पीड़न से मुक्ति दिलाने के लिए मजदूरों के संगठित होने का आह्वान किया गया। तभी से राजनीतिक दल खानापूर्ति के लिए मेनिफेस्टो निर्वाचन से पूर्व जारी करते हैं। पूंजी के विषय में दास कैपिटल में विस्तृत वर्णन किया गया है।

यह बहुत स्पष्ट है कि श्रम क्षण-क्षण नाशवान है। इसी का लाभ उठाकर पूंजीपतियों ने मजदूरों का शोषण किया है। साधारण भाषा में यह कहा जा सकता है कि मजदूर वही है जिसके पास श्रम को बेचने के सिवा, जीविकोपार्जन का कोई और साधन नहीं है। पहले श्रम ग्रामीण क्षेत्रों में मात्र कृषि कार्य में लगाया जाता था। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में इसका एक शोषणविहीन प्रयोग देखने को मिलता है, जिसमें अनेक स्थानीय स्तर के लघु और ग्रामीण उद्योग शामिल थे, जिनमें श्रमिक अपना श्रम बेचकर आत्मनिर्भर रहते थे।

वर्तमान त्रासदी को भोगने और देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि इन मजदूरों का भविष्य नहीं होता और नहीं यह भविष्य के विषय में चिंतित होते हैं। इनका भविष्य इनके भगवानों, ढोंग, आडंबर, अंधविश्वास, तंत्र मंत्र, पाखंड, देवी देवता जैसे अनेक कर्मकांडों तथा छल, कपट, धोखाधड़ी और धार्मिक व सामाजिक अनुष्ठानों में समाहित होता है। वह अपना भाग्य और भविष्य बाहर नहीं देख पाते। यह कोसों दूर होते हैं। सत्य का सामना कभी नहीं होता। पढ़ना तो जैसे इनके भाग्य में है ही नहीं। यही इनकी मनोदशा होती है।

इन्हें अपने जीवन का सार समझना हो तो यह तथाकथित संत, महात्मा, महापुरुषों, उनके प्रवचनों और चरणों में ढूंढते हैं जो इन्हें कभी नहीं मिलता, लेकिन कोरोना के भय ने भविष्य को आईना के रूप में बदलकर एहसास करा दिया है कि मजदूरी का प्रेम से कोई संबंध नहीं है। नगरीय सभ्यता स्वार्थों से परिपूर्ण है और वो चंद सिक्के देकर अपने कर्तव्‍य की इतिश्री कर लेते हैं। इनके लिए फुटपाथ और पड़ोस में मदिरालय ही नसीब होता है। ऐसा प्रतीत होता है कि मजदूरों का होना उन पर निर्भर नहीं है। यह उनके खुद के लिए भी आश्चर्य का विषय है कि वह अपना परिचय सच या यथार्थ किसी और में तलाशते हैं।

जिन राज्यों में अस्थाई निवास करके मजदूरों ने अपनी सेवाएं दी हैं उन राज्यों के विकास को देखकर भी उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, उड़ीसा, बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़ जैसे अनेक राज्यों ने कोई सीख नहीं ली अन्यथा यह अपने राज्य में उन श्रमिकों के कार्य कौशल के अनुसार कुशलता विकसित करके इन्हें रोजगार के साधन उपलब्ध कराते। खेती तब और बदतर हुई जब उन्हें अपने कार्यस्थल वाले राज्यों से भूमिहीन बनाकर पलायन करने को बाध्‍य किया गया और उनको अपने गांव वाले राज्य में प्रवेश नहीं करने दिया गया। इनकी स्थिति रोहिंग्या और बांग्लादेशी प्रवासी लोगों से कम नहीं है।

गुमनामी से अब तक गुलामी को ढो रहे श्रमिकों ने पहली बार अपने बलबूते यह निर्णय किया कि गांव की ओर चलना चाहिए। यद्यपि इनका कोई संगठन कार्य नहीं कर रहा था। विवेक से या भय से ही सही, गाँव को निकल पड़े। मालिकों ने इनका वेतन या राह खर्च भी देने से मना कर दिया। यहाँ तक कि मकान मालिकों ने किराये के बदले इनका सामन भी रखवा लिया। क्या यही “वसुधैव कुटुम्बकम” है? जब इनको रास्तों में पुलिस वालों ने न केवल रोका बल्कि इनके साथ अभद्र व्यवहार भी किया तो इन्होंने मुख्य मार्ग छोड़कर रेल की पटरियों का सहारा लिया, लेकिन सैकड़ों किलोमीटर पैदल नापकर अपने घर पहुंचे क्योंकि यह मृत्यु का वरण भी अपनों के बीच करना चाहते थे।

कुछ रास्ते में अकाल, काल-कवलित हो गए। इनकी मजदूरी में वह प्रेम या चाहत मालिक पैदा नहीं कर सका, जो इनको सहानुभूति के रूप में भी मिलता और संकट की इस घड़ी में इनकी मदद के लिए उनके हाथ आगे बढ़ते। यह मानवीय संवेदनाओं का मरना नहीं तो और क्या है? गांव वापस आने से इनमें यह चेतना आई है कि वे हमेशा बिना रास्ते, मंजिल के अंधेरे में ही दौड़ते रहे हैं। दुर्भाग्य से जब वह नए समय के दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं तब इनकी मजबूरी यह है कि इनका कोई संगठन नहीं है, जो इनकी इस समस्या को जन संघर्ष के रूप में बदलने की क्षमता विकसित करके इनके श्रम का उचित मूल्य इनको दिलवा दे।

इनके जो तथाकथित संगठन हैं भी, वे विभिन्न राजनीतिक दलों की कठपुतली और किसी विचारधारा की आँख के तारे बने हैं, जो इनके शोषण में ही सहायक हैं। अव्यवस्था के कारण ऐसा लगता है कि उन्हीं परिंदों की भांति, फिर यह अपने कार्य स्थलों पर वापस जाएंगे, क्योंकि वर्तमान में जो सामंती व्यवस्था है, उसके अंतर्गत इन्हें अपने गांव में खाता-पीता दूसरे समाज के लोग नहीं देख सकते और इनका दैहिक, दैविक और भौतिक शोषण रोकना संभव नहीं है।

मजदूरी न मिलना तो एक समस्या है, लेकिन सम्मान के साथ जीवन यापन करना यह समस्या सभी जगह भयावह रूप से है, लेकिन वापस आने पर गांव में सम्मान के साथ कुछ दिन गुजार सकते हैं। देखना यह है कि समय का परिंदा कब और किस करवट बैठता है। यह मजबूरन कुछ करने की स्थिति में नहीं है क्योंकि या तो भूख से मरें या बीमारी से इनकी, खबर लेने वाला कोई नजर नहीं आता। राज्य स्तरीय सरकारों की कोई सोच इनका उत्थान एवं विकास करने की नहीं है। केवल एक बटन दबाने के लिए इनका उपयोग पंचवर्षीय योजना की तरह किया जाता है।

यह स्थिति अंतरराज्यीय मजदूरों की है। अन्तर्देशीय स्तर पर बड़ी संख्या में मजदूर, व्‍यापारी, शिक्षक, डाक्टर, वकील, अनुसन्धान करने वाले, प्रबन्धक इंजीनियर, प्रशासक आदि विदेशों में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं और वहां के अर्थतंत्र को न केवल मजबूती प्रदान करते हैं बलिक अपनी दक्षता भी विकसित किये हैं। अनेक देशों में वहां के मूल नागरिकों की तुलना में सकल विकास दर में योगदान अधिक है। महामारी से स्थिति बिगड़ने के कारण अनेक भारतीयों ने कतिपय कारणों से अपने देश वापिस आने के प्रयास किये हैं।

विगत अठाईस वर्षों में प्रवासी मजदूरों की प्रति व्‍यक्ति आय में 552 फीसदी की वृद्धि हुई है। दुनिया के 48 देशों में रह रहे भारतीय ने 2018 में 57 हजार करोड़ रूपया भारत भेजा। इन मजदूरों के लाने के लिए विशेष विमान निशुल्क भेजे गए जो कोरोना वाहक बने, जब कि राज्यों से यातायात के लिए पैदल चलने पर रोक था। बाध्यकारी ब्रेन ड्रेन अस्थायी रूप से रुका और ब्रेन गेन हुआ, लेकिन जब इस गेन को अपने देश में उपयोग नहीं कर सकेंगे तो फिर ड्रेन होगा ही।

प्रश्न यह है पूर्ण लॉक डाउन में बिना सरकारों की सहमति के मजदूर सड़कों पर कैसे आये? देशी और परदेशी मजदूरों को उपलब्ध करायी विभेदकारी सेवाओं में पूंजीवाद की बू आती है। श्रम ब्यथा बहुत लम्बी है, पर सरकारों की सोच उनकी दिशा निश्चित करके दशा सुधारने की नहीं है तो उन्हें स्वय इसकीं कमान संभालनी होगी।

 लेखक नवल किशोर आईसीसीएमआरटी के पूर्व निदेशक हैं।