क्‍या राजीव गांधी वाली गलती दोहरा रहे हैं नरेंद्र मोदी!

नरेन्द्र श्रीवास्तव

लखनऊ। रविवार की रात नौ बजे। एक मनोरंजन चैनल पर मनमोहक संगीत से सराबोर गायकी का एक बेहतरीन कार्यक्रम आता है। शनिवार और रविवार रात नौ बजे से करीब डेढ घण्टे यह प्रोग्राम आता है। यह इतना बेहतरीन लगता है कि संगीत की एबीसीडी नहीं जानने के बावजूद मैं इसे देखता हूँ। इस कार्यक्रम को डेढ़ घण्टे के बाद दोबारा उसी चैनल पर प्रसारित किया जाता है।

इस रविवार नौ बजे से मैं इसे नही देख पाया था। इसलिए मैंने तय किया कि साढ़े दस बजे से इसे देखूंगा। रात बारह बजे के आस-पास मुझे लगा कि इसमें दोहरा मापदण्ड अपनाया गया। इस रविवार इसमें प्रतिभागियों के परिवारों को भी आमंत्रित किया गया था। उत्तर प्रदेश के लखीमपुर से एक बाल्मीकि (दलित) युवक भी इसमें चुना गया है।

इस कार्यक्रम में चुना जाना ही अपने आप में चुनौती है। देश के महान संगीतज्ञ इसमें जज की भूमिका में हैं। इस कार्यक्रम का जिक्र करने के पीछे एक मकसद है। सभी प्रतिभागियों के परिजन मंच पर आ सकते हैं तो उस बाल्मीकि युवक के क्यों नहीं। मुम्बई के एक प्रतिभागी की तो पूरी सोसाइटी ही मंच पर बुला ली गयी थी।

हो सकता है कि बाल्मीकि युवक के घर से कोई आया ही न हो। यह भी हो सकता है कि उसके घर से कोई आना ही नहीं चाहता हो। यदि, यह सही भी हो तो इसका जिक्र उद्घोषक द्वारा किया जाना चाहिए था। क्योंकि कार्यक्रम में ही शामिल एक जिम्मेदार व्यक्ति ने संचालक को बालीवुड का सबसे अच्छा उद्घोषक करार दिया था।

कार्यक्रम में मनोरंजन के जरिये संचालन के दौरान छोटी से छोटी जानकारी भी देने में पीछे नहीं रहने वाले उद्घोषक ने इस बारे में क्यों नही कुछ बताया। सामाजिक समरसता के पक्षधर लोगों का मानना है कि बाल्मीकि युवक के परिवार, मित्र या किसी अन्य सगे सम्बन्धी को मंच पर बुलाया जाना चाहिए था।

एक प्रतिभागी की दादी तो अक्सर मंच पर दिखाई देती है, हालांकि उनका मंच पर आना अच्छा लगता है। वह अपने आप में ही एक संदेश हैं। उन्हें जिंदादिली से जीने की संदेशवाहिका माना जा सकता है। कुछ लोग हो सकता है कि बाल्मीकि युवक के जिक्र की आलोचना करें। लेकिन सवाल तो बनता ही है।

जब सभी प्रतिभागियों के परिवार मंच पर दिख सकते हैं तो उस दलित युवक के क्यों नहीं। इसका जिक्र कर समाज के एक बड़े तबके की उपेक्षा की ओर इशारा करने की कोशिश की गयी है। इसके बावजूद तमाम ऐसे लोग मिलेंगे जो दो दिन पहले संसद से पारित अनुसूचित जाति/जनजाति उत्पीड़न निवारण अधिनियम (दलित उत्पीड़न अधिनियम) संशोधन विधेयक पर उंगली उठा सकते हैं।

देश आजाद हुए इकहत्तर वर्ष से ज्यादा हो गया। फिर भी, सामाजिक न्याय का सपना अधूरा है। शायद, इसीलिए केन्द्र सरकार को दलित उत्पीड़न अधिनियम में संशोधन की जरूरत महसूस हुई कुछ लोग इसे वोट बैंक की राजनीति भी मान रहे हैं। हो सकता है इस राय को मानने वाले अपने स्थान पर सही हैं। लेकिन सवाल उठता है कि संशोधन की जरूरत क्यों पड़ी इकहत्तर वर्ष की आजादी के बाद भी समाज के एक बड़े तबके के मान सम्मान के लिए इस तरह का संशोधन जरूरी माना गया।

हो सकता है कई लोगों को बाल्मीकि युवक का मसला छोटा लगे। लेकिन, यह घटना सामाजिक आईना भी है। इस तरह की घटनाये तमाम जगह दिख जाती हैं। समाज में फैली इस तरह की विकृतियों को दूर करने के लिए सरकारी पक्ष को कभी-कभी कड़े फैसले लेने पड़ते हैं। समाज यदि स्वतः भेदभाव,  दुराव, छुआछूत और कमजोर का उत्पीड़न जैसी कुरीतियां दूर कर ले तो शायद सरकार को ऐसे कड़क कदम उठाने की जरूरत नही पड़े।

इस तरह के फैसले की पहल करने वाली सरकार या पार्टी को राजनीतिक लाभ मिलने की सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता। मोदी सरकार ने पहले राज्यसभा से और बाद में लोकसभा से इस सम्बन्ध में संशोधन विधेयक पारित करवा दिया। विधि विशेषज्ञों की राय में  इसके कानूनी जामा पहन लेने के बाद रिपोर्ट दर्ज होने के बाद आरोपी भी कभी भी गिरफ्तारी हो सकती है।

हालांकि, उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी थी कि इस अधिनियम में मुकदमा दर्ज होने के बाद विवेचना हो। लगे कि आरोपी प्रथम दृष्टया दोषी है तभी गिरफ्तारी की जाय। लोकतांत्रिक शासन पद्धति में सर्वोपरि संसद ने उच्चतम न्यायालय की इस व्यवस्था को पलट दिया। कई लोग सरकार के इस कदम की मुखालफत करने लग गये। उत्तर प्रदेश में सत्ताधारी दल के एक विधायक ने इस्तीफा देने तक की धमकी दे डाली है।

केन्द्र में मंत्री रहे भारतीय जनता पार्टी के एक वरिष्ठ नेता का साफ कहना है यह संशोधन सवर्णों के हित में नहीं है। उन्हें इसके दुरुपयोग की आशंका है। वह इसकी तुलना राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में बहुचर्चित शाहबानो प्रकरण से करते हैं। उस समय उच्चतम न्यायालय के शाहबानो के पक्ष में आये फैसले को प्रचण्ड बहुमत वाली राजीव गांधी सरकार ने संसद के जरिये पलट दिया था। कानून ही बदल दिया गया था।

चर्चा थी कि राजीव गांधी सरकार मौलानाओं के दबाव में आ गयी। उसी तरह, कुछ लोगों का मत है कि मोदी सरकार ने दलित नेताओं के दबाव में संशोधन करवाया। हालांकि इस मसले पर सरकार को विपक्ष का भी समर्थन मिला है। बहरहाल, मामला कुछ भी हो लेकिन ऐक्ट में संशोधन तो राजनीतिक विश्लेषक अपने-अपने ढंग से व्याख्या कर रहे हैं।

कई इसे मोदी सरकार का ‘‘सोशल जस्टिस‘‘ की ओर एक कदम बता रहे हैं तो ज्यादातर इसे वोट बैंक की मजबूरी करार दे रहे हैं। देश में दलितों की अच्छी खासी आबादी है। लोकसभा का आम चुनाव नजदीक है ऐसे में इस तरह का कदम आश्चर्यजनक नहीं कहा जा सकता। उत्तर प्रदेश के ज्यादातर दलित बहुजन समाज पार्टी के समर्थक माने जाते हैं।

यूपी में लोकसभा की अस्सी सीटें हैं। 2014 में इसमें से 73 सीटे हासिल कर नरेन्द्र मोदी ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनायी थी। इधर सपा-बसपा के एक मंच पर आने की जोरदार चर्चा है। विश्लेषक मानते हैं कि भाजपा प्रस्तावित इस गठबंधन का तोड़ निकालने की पुरजोर कोशिश में लगी हुई है। इस संशोधन को भी कई  विश्लेषक इसी नजरिये से देख रहे हैं।

ऐसे विश्लेषकों का साफ मानना है कि मोदी सरकार ने दलित उत्पीड़न निवारण अधिनियम में संशोधन और पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देकर और डा. अम्बेडकर से जुडे़ पांच महत्वपूर्ण स्थलों को पंचतीर्थ घोषित कर पिछड़ों और दलितों को अपनी ओर रिझाने की कोशिश की है। हालांकि, वह इसमें कितना सफल हुए है यह तो आने वाला समय ही बतायेगा।

लेखक नरेंद्र श्रीवास्‍तव उत्‍तर प्रदेश के जानेमाने वरिष्‍ठ पत्रकार हैं.