मोदी का भाषण मन में ऊब, खीझ एवं वितृष्णा पैदा कर सकता है

कुमार नरेन्द्र सिंह

कोई शक नहीं कि लाला किले की प्राचीर से दिया गया प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का इस बार का भाषण भी उनके पिछले भाषणों की तरह ही चतुराई और वादों से भरा एक ओजस्वी भाषण था। लेकिन उसी अनुपात में वह सच्चाई से कटा हुआ भी था। उनका पुरा भाषण सुनने के बाद ऐसा महसूस होता है, जैसे वह देश को संबोधित नहीं कर रहे थे, बल्कि चुनाव प्रचार कर रहे थे। न तो कहीं किसी चिंता का इजहार था, और न किसी व्यापक दृष्टि का परिचय। अपने पूरे भाषण के दौरान मोदी जहां स्वयं को एक मजबूत, निर्णय लेने वाले और खतरा उठाने वाले एक नेता के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश करते नजर आए, वहीं अपनी सरकार की उपलब्धियों का इस तरह गुणगान करते रहे, जैसे देश में पहली बार किसी सरकार ने कोई काम किया हो। एक तरह से वह उन्हीं पुरानी और घिसी-पिटी बातों को दोहराते रहे, जो उन्होंने पिछले महीने अविास प्रस्ताव के दौरान कहा था।

जाहिर है कि एक ही बात को बार-बार दोहराने से जनता में ऊब पैदा होती है, और ऐसा देखने को भी मिला, जब उपस्थित जनता ने मोदी की बातों पर ताली बजाना बंद कर दिया। एक ऐसे समय में जब राजनेताओं में जनता का विास कम होता जा रहा है, मोदी का भाषण उनके मन में ऊब, खीझ और वितृष्णा पैदा कर सकता है।दरअसल, उनका यह भाषण हाल के उस जनमत सर्वेक्षण के तुरंत बाद आया है, जिसमें तीन राज्यों- राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़-में भारतीय जनता पार्टी की पराजय की आशंका जताई गई है। इतना ही नहीं, उनका यह भाषण तब आया है, जब चुनाव आयोग ने तीनों राज्यों में विधानसभा की कार्यावधि बढ़ाने से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया, जिससे देश भर में विधानसभा और लोक सभा के चुनाव साथ-साथ कराने के मोदी के प्रयास को धक्का लगा।

प्रधानमंत्री मोदी को आशा थी कि यदि दोनों चुनाव साथ-साथ होते हैं, तो उनकी व्यक्तिगत छवि स्थानीय सत्ता-विरोधी रुझान को रोकने में कामयाब हो सकती है। आज स्थिति यह है कि देश के अनेक तबके मोदी राज से नाराज हैं, जिनमें अल्पसंख्यक, दलित, पिछड़े सहित बेरोजगार युवकों की संख्या भी शामिल है। सच तो यह है कि राष्ट्र के नाम संदेश के जरिए वास्तव में वह इन तबकों से मिलने वाली चुनावी चुनौतियों को ही संबोधित कर रहे थे। कहने की आवश्यकता नहीं कि उपर्युक्त मुद्दों पर मोदी सरकार का रिकॉर्ड बहुत ही खराब रहा है। सवाल है कि क्या अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधी) कानून के प्रावधानों की पुनर्बहाली सहारनपुर हिंसा के बाद उत्तर प्रदेश की जेलों में बंद भीम आर्मी के कमसिन युवकों के मन को शांत कर पाएगी या भीमा कोरेगांव कांड के बाद अनुचित तरीके से जेलों में बंद दलितों को भाजपा के समर्थन में मोड़ सकती है? इसी तरह सवाल यह भी है कि क्या पिछड़े वगरे के लिए बने राष्ट्रीय आयोग को कानूनी दरजा देने भर से पिछड़े भाजपा के समर्थक बन जाएंगे? क्या आत्महत्या करने वाले किसानों के परिजन मोदी की इस बात का विास कर लेंगे कि उनकी आमदनी दुगुनी हो गई है?

जाहिर है कि इन सवालों का जवाब केवल नकारात्मक ही हो सकता है। इसके उलट इस बात की आशंका ज्यादा है कि मोदी का यह बड़बोलापन उनके लिए कर्ण कटु साबित हो सकता है।भरोसा दिलाना चाहते हैं प्रधानमंत्री प्रधानमंत्री के भाषण से ऐसा महसूस होता है, जैसे वह देश को विास दिलाना चाहते हैं कि केवल उन्हीं की सरकार ने टॉयलेट्स से लेकर इंडियन इंस्टीटय़ूट ऑफ टेक्नोलॉजी (आईआईटी) और इंडियन इंस्टीटय़ूट ऑफ मैनेजमेंट स्थापित कर रही है, गांव-गांव में बिजली और घर-घर रसोई गैस पहुंचा रही है, संचार की सुविधा के लिए ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क स्थापित कर रही है, राष्ट्रीय उच्च मागरे का निर्माण कर रही है, और स्किल डवलपमेंट कार्यक्रम के जरिए उद्यमिता को बढ़ावा दे रही है। मोदी के भाषण से यह भी स्पष्ट होता है कि उनके प्रधानमंत्री बनने के पहले भारत एक पिछड़ा, आलसी और महत्त्वाकांक्षाविहीन देश था। यह भी कि उनके पहले सर्जिकल स्ट्राइक जैसा कदम उठाने में कांग्रेस सरकारें डरती रही थीं। अपनी बातों को सही साबित करने के प्रयास में मोदी ने अपनी पूववर्ती सरकारों विशेषकर कांग्रेस सरकार की जिस तरह आलोचना की और उसकी नाकामियां गिनाई, उनसे साबित होता है कि कांग्रेस की आलोचना करना उनका स्थायी भाव बन गया है। कांग्रेस का भूत उन्हें अब भी परेशान करता है। अपनी और अपनी सरकार की उपलब्धियों का गुणगान करते वक्त शायद मोदी भूल गए कि जिस साल उनका जन्म हुआ था, उसी साल यानी 1950 के सितम्बर माह में देश का पहला आईआईटी संस्थान स्थापित हो चुका था।

इसी तरह ग्रामीण बिजलीकरण योजना का आरंभ उनके जन्म के तीन साल पहले ही हो चुका था और उनके प्रधानमंत्री बनने के पहले 97 प्रतिशत गांवों में बिजली पहुंच चुकी थी। इसी तरह राज्य और केंद्रीय ट्रैक्टर ऑर्गनाइजेशन की स्थापना 1947 में हो चुकी थी। तय तो यह भी है कि जब वह आठ साल के ही थे, तो देश में हरित क्रांति का आगाज हो चुका था और घनश्यामदास बिड़ला, अर्देशिर गोदरेज, गोविन्दराम सक्सरिया, जमशेद जी टाटा, जमना लाल बजाज, वालचंद हीराचंद दोशी, कैलाशचंद्र महिन्द्रा आदि जैसे उद्योगपति भारत की उद्यमशीलता को पंख लगा चुके थे। तय यह भी है कि मोदी की सर्जिकल स्ट्राइक के पहले भारत, पाकिस्तान को चार युद्धों में पराजित कर चुका था। वैसे भी उनके दावे के प्रतिकूल सर्जिकल स्ट्राइक से भारत के खिलाफ आतंकवादी हमलों पर न तो नकेल लग सकी और न ही पाकिस्तान के साथ रिश्ते ही बेहतर हो सके।नये नैरेटिव गढ़ने की चुनौती मोदी भारत के प्रधानमंत्री हैं, इसलिए उनसे अपेक्षा थी कि वह उन मुद्दों पर जरूर मुंह खोलेंगे, जिनके चलते देश का सामाजिक ताना-बाना बिगड़ रहा है। सर्वविदित है कि भाजपा के सत्ता में आने के बाद भारत एक डरावने गणतंत्र में तब्दील होने लगा है।

सरकार के कायरे व उसकी नीतियों की आलोचना करने वाले खतरे में हैं, अल्पसंख्यक हाशिये पर डाल दिए गए हैं, लंपटई और कानून हाथ में लेने वालों पर सरकारी मेहरबानी टपक रही है, और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंटने के लिए सरकारी संस्थाओं का दुरुपयोग किया जा रहा है। लेकिन मोदी ने मॉब लिंचिंग, गोरक्षकों की गुंडागर्दी, दलितों के खिलाफ हिंसा और अल्पसंख्यकों के विरुद्ध फैलाई जा रही घृणा और होने वाली हिंसा पर उनकी जुबान नहीं खुली तो नहीं खुली। इन मामलों के संदर्भ में उन्होंने यदि कुछ भी किया होता तो लोग उनकी बातों को निश्चित रूप से स्वीकार करते लेकिन उनके वादे और हकीकत के बीच कोई संबंध नहीं होने के कारण लोगों के लिए पचाना संभव नहीं दिखाई देता। चाहे किसानों को फसल का न्यूनतम मूल्य दिए जाने का मामला हो या आर्मी पेंशन या फिर खुला शौच मुक्त गांव का अभियान हो, विवादों से परे नहीं है। इसी तरह बेरोजगारी के सवाल पर भी उन्होंने मौन साधे रखना ही उचित समझा। जाहिर है कि मोदी की रैलियों में नमो-नमो का नारा गुंजायमान करने वाले बेरोजगार नौजवान पकौड़ा तलने और सीवर के गैस से चाय बनाने की सलाह से संतुष्ट नहीं हो सकते।

मोदी की इस बात को वे शायद ही स्वीकार कर पाएं कि जीविका तो है, लेकिन आंकड़े नहीं हैं। महिलाओं की सुरक्षा को लेकर जताई गई उनकी चिंता वाजिब तो हो सकती है, लेकिन तब उनकी चिंता का कोई अर्थ नहीं रह जाता है, जब हम देखते हैं कि उनकी ही सरकार का एक मंत्री राजन गोहैन बलात्कार के आरोप से घिरा है, और उनके दल के अनेक मंत्री, सांसद उत्तर प्रदेश से लेकर जम्मू-कश्मीर तक बलात्कारियों का बचाव कर रहे हैं, लिंचिंग करने वालों का स्वागत कर रहे हैं। अपने पूरे भाषण के दौरान मोदी बेचैन, व्याकुल, व्यग्र, अधीर और आतुर दिखाई देते रहे, जिससे साबित होता है कि उनकी चिंता केवल फिर से सत्ता हासिल करने की है, न कि एक मजबूत लोकतांत्रिक और घर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाने की। वैसे भी उनका नैरेटिव (आख्यान) पुराना पड़ चुका है। 2019 के चुनावों में जीत हासिल करने के लिए उनके सामने एक नया नैरेटिव गढ़ने की चुनौती दिखाई दे रही है। कोई भी इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि आज मोदी का करिश्मा उतार पर है। ऐसे में केवल शब्दों से काम नहीं चलने वाला है। वादे को अमली जामा पहना कर ही वह नये नैरेटिव की रचना कर सकते हैं।kumar

कुमार नरेंद्र सिंह वरिष्‍ठ एवं देश के जानेमाने पत्रकार हैं। वह राष्‍ट्रीय सहारा, हमार टीवी, नई दुनिया समेत कई संस्‍थानों में वरिष्‍ठ पद पर काम कर चुके हैं। फिलहाल वह पाक्षिक पत्रिका लोक स्‍वामी के संपादक के तौर पर काम कर रहे हैं।