अब शायद ही कभी हो पाए दीनदयाल उपाध्याय की हत्‍या की जांच!

नरेंद्र श्रीवास्‍तव

: मुकदमे की फाइल ही है नदारद : लखनऊ : 26 सितम्बर भारतीय जनता पार्टी के प्रेरणास्रोत पंडित दीनदयाल उपाध्याय की संदिग्ध परिस्थितयों में करीब पचास साल पहले हुई मृत्यु के सम्बन्ध में दर्ज मुकदमे की फाइल ही नदारद है। यह मामला दीनदयाल उपाध्यायजी की मृत्यु के कारणों पर सवाल उठाने वाले एक शिकायती प़त्र की जांच के दौरान प्रकाश में आया।

अम्बेडकरनगर जिले के भारतीय जनता पार्टी कार्यकर्ता राकेश गुप्ता ने पिछले वर्ष छह नवम्बर को केन्द्रीय गृह मंत्रालय को पत्र भेजकर श्री उपाध्याय के मृत्यु के कारणों की जांच केन्द्रीय जांच ब्यूरो से कराने की मांग की थी। पत्र की प्रति राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केन्द्रीय गृहमंत्री, मुख्यमंत्री, राज्य के प्रमुख सचिव गृह और पुलिस महानिदेशक को भी भेजी गयी थी।

पत्र में मृत्यु के वास्तविक कारणों को छिपाने का आरोप लगाया गया था। तत्कालीन सत्ताधारी दल की भूमिका पर भी अंगुली उठायी गयी थी। पुलिस अधीक्षक रेलवे हिमांशु कुमार ने बताया कि वाराणसी जीआरपी के क्षेत्राधिकारी विमल चन्द्र श्रीवास्तव ने शिकायतकर्ता का बयान दर्ज कर लिया। शिकायतकर्ता ने आरोपों के पक्ष में कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया बल्कि कहा कि उसने चर्चाओं के आधार पर शिकायत की थी।

क्षेत्राधिकारी की रिपोर्ट उच्चाधिकारियों को भेज दी गयी है। उन्होंने बताया कि श्री गुप्ता यदि आरोपों के सम्बन्ध में कोई सबूत पेश करते तो जांच आगे बढ़ायी जाती। पुलिस अधीक्षक रेलवे ने बताया कि मुकदमे की फाइल न तो थाने में मिली और न ही अदालत में इस सम्बन्ध में कुछ पता चल सका। जांच अधिकारी ने थाने और अदालत दोनों जगह से इस महत्वपूर्ण फाइल के बारे में जानकारी हासिल करने की कोशिश की।

श्री उपाध्याय की मृत्यु 11 फरवरी 1968 को हुई थी। मुगलसराय जीआरपी थाने में भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 के तहत अपराध संख्या 67/68 पर मुकदमा दर्ज हुआ था। इस मामले में वाराणसी के चोलापुर थाने के चंदापुर गांव के भरत लाल, रामअवध और लालता को गिरफ्तार किया गया था, लेकिन जांच में हत्या साबित नहीं हुआ। दो आरोपियों राम अवध और लालता को अदालत ने बरी कर दिया था। भरत लाल को चारी के आरोप में चार वर्ष की सजा सुनाई गयी थी।

वरिष्‍ठ पत्रकार नरेंद्र श्रीवास्‍तव की रिपोर्ट. एफबी से साभार लेकर प्रकाशित.