नीरज ने तभी कहा था, “मेरे जाने के 30 दिन के भीतर अटल भी आएंगे”

संजय तिवारी 

: भविष्‍यवाणी हुई सच : तब कहा था- अखबार, शादी से ज्‍यादा जरूरी है : लखनऊ : महाकवि डॉ. गोपालदास नीरज जितने साहित्य के मर्मज्ञ थे, उतने ही ज्योतिष शास्त्र में भी पारंगत, गुरुवार को अटलजी के निधन के साथ महाकवि की भविष्यवाणी भी सच साबित हो गई।  दरअसल, नीरजजी ने नौ साल पहले 2009 में यह भविष्यवाणी की थी कि मेरे और अटलजी के निधन में 30 दिन से ज्यादा का अंतर न रहेगा, हुआ भी ऐसा ही। नीरजजी 19 जुलाई को दुनिया छोड़ गए और 29 दिन बाद अटलजी निकल पड़े अनंत यात्रा पर।

तब बहुत खुल कर बोले थे नीरज जी : अटलजी को जब भारत रत्न मिला तब नीरज जी से बात करने का अवसर मिला। उस समय बहुत खुल कर बोले थे महाकवि – अटल विहारी वाजपेयी से मेरे संबंध बहुत पुराने हैं। सबसे पहले उन्हें भारत रत्न दिए जाने पर उन्हें शुभकामनाएं देता हूं हालांकि यह सम्मान उन्हें पहले ही मिल जाना चहिए था। फिर वह कुछ याद करने लगे।

थोड़ा रुक कर बोले – मैं कानपुर के डीएवी कॉलेज से हिंदी से एमए कर रहा था और वहीं हॉस्टल में रहता था। उसी दौरान अटल बिहारी वाजपेयी अपने पिताजी के साथ डीएवी कॉलेज में विधि संकाय में एडमिशन लेने आए। वह उसी हॉस्टल में रहने लगे, जिसमें मैं रहता था। वह राष्ट्रवाद और वीर रस की कविताएं कहते थे, जबकि मैं मूलत: गीत लिखता था। बस यहीं से कविता के मंच साझा होना शुरू हो गए।

अपनी और अटल जी की काव्य यात्रा पर खूब बातें की :  अपनी और अटलजी की काव्य यात्रा को लेकर उस दिन उन्होंने खूब बातें की। बोले – 50 के दशक तक मेरे गीत लोकप्रिय होने लगे। इसी बात को ध्यान में रखते हुए अटल जी ने मुझे ग्वालियर में एक कवि सम्मेलन के लिए आमंत्रण दिया। उस कवि सम्मेलन के संयोजक राजनारायण बिसारिया थे। मैंने और अटलजी ने आगरा से ग्वालियर के लिए ट्रेन पकड़ी, लेकिन वह बहुत ही लेट हो गई। तांगा पकड़ कर कवि सम्मेलन स्थल तक पहुंचे तो वहां कोई नहीं था। आयोजन समाप्त हो चुका था। इत्तेफाक से मेरे और अटलजी के पास सारे पैसे खत्म हो चुके थे।

इधर-उधर तलाश करने पर संयोजक राजनारायण बिसारिया चाट खाते हुए मिल गए। हमें देखकर बोले कवि सम्मेलन का भुगतान (51 रुपये प्रति कवि) तो नहीं दे पाएंगे। मैंने अटलजी से कहा तुम्हारा तो ये शहर है रात गुजारने का इंतजाम तो करो। इस पर अटल जी ने ठहरने की व्यवस्था करवाई और राजनारायण ने इस बात पर हामी भरी कि अगले दिन एक गोष्ठी कर ली जाएगी, जिसका भुगतान कर दिया जाएगा।

उस समय वह विदेश मंत्री थे :  फिर थोड़ी देर तक दादा चुप हो गए, जैसे कुछ याद कर रहे हों। कुछ देर रुक कर बोले – इसके बाद अजमेर में एक कवि सम्मेलन में अटलजी से मुलाकात हुई। उस समय वह विदेश मंत्री थे। इसमें पुरानी सभी बातें ताजा हो गईं। जब वह प्रधानमंत्री बने तो उनकी कविता और मेरे गीत पर प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना उमा शर्मा ने दिल्ली में प्रस्तुति दी थी।

इसके अलावा एक बात मैं और कहना चाहूंगा कि मेरी और अटल बिहारी वाजपेयी की जन्म कुंडली में सिर्फ चंद्रमा की स्थिति भिन्न है। बाकी पूरी कुंडली एक समान है। सात दिनों का उनके और मेरे जन्म में अंतर है। यही कारण है कि मैंने और अटल ने कवि के रूप में ही शुरुआत की थी। चंद्रमा की स्थिति ने उन्हें राजनीति में पहचान दिलाई।

इन यात्रियों को हम कुछ और दिन के लिए नहीं रोक सके :  आज नीरजजी भी नहीं हैं और अटलजी भी चले गए तो इन महामनीषियों की बातें याद आ गयीं। दोनों ही मनीषी 93 की उम्र तक धरती पर रहे। यहाँ आये भी थे बहुत कम समय के अंतर पर और गए भी उसी अनुपात से। समय, धरती, काव्य और सन्दर्भ सब धरे रह गए, लेकिन इन यात्रियों को हम कुछ और दिन के लिए नहीं रोक सके।

लखनऊ के अटल जी : लखनऊ तो उनका अपना घर ही है, लेकिन यहाँ उनका कोई घर नहीं है। उन्होंने घर बनाया ही नहीं। लगभग 70 उनके यही बीते हैं। अनगिनत यादे हैं। अनगिनत घटनाएं हैं। अनगिनत बाते हैं। अनगिनत कहानियां हैं। अटलजी और लखनऊ के रिश्ते को कुछ शब्दों में बाँध पाना बहुत कठिन है। फिर भी यहाँ उनके कुछ खास संस्मरण प्रस्तुत हैं।

अखबार, शादी से ज्यादा जरूरी :  अटल बिहारी वाजपेयी जी लखनऊ में स्वदेश अखबार के संपादक थे। उसी दौरान कानपुर में अटलजी की बहन का विवाह समारोह पड़ा। शादी के दिन नानाजी देशमुख ने अटलजी से कहा कि आज तुम्हारी बहन की शादी है। अटल जी बोले, ‘अखबार, शादी से ज्यादा जरूरी है।’

नानाजी चुपचाप कानपुर चले गए। वहां उन्होंने दीनदयाल उपाध्याय से ये बात बताई। दीनदयालजी कानपुर से लखनऊ आए। वह अटल से कुछ नहीं बोले और कंपोजिंग में जुट गए। शाम हुई तो उपाध्यायजी ने अटलजी से कहा,  ‘यह जो गाड़ी खड़ी है। इसमें तुम तुरंत कानपुर जाओ। बहन की शादी में शामिल हो और मुझसे कोई तर्क मत करना।’

लखनऊ के होकर ही रहे :  करीब 70  बरस अटलजी ने लखनऊ में गुजारे। प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से वे हमेशा इस शहर के ही होकर रह गए। लेकिन आज तक इस शहर में उनकी न ही एक इंच जमीन है और न ही कोई झोपड़ी।

मैं केवल कुर्ता पहन लूँ और पैजामा न पहनू तो :  अटल बिहारी वाजपेयीजी लखनऊ में भाजपा केतत्कालीन मेयर प्रत्याशी डॉ दिनेश शर्मा के पक्ष में आलमबाग के चन्दरनगर में एक सभा कर रहे थे। भाषण के बीच में अटलजी बोले ‘मान लो कि मैं केवल कुर्ता पहन लूँ और पैजामा न पहनू तो? आप लोगों ने मुझे सांसद बनाकर कुरता दे दिया है, अब दिनेश को मेयर बनाकर पैजामा भी देना।’

अब जब सोचता हूं तो कोई मिलती नहीं :  अटल बिहारी वाजपेयीजी से एक दिन इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रों का एक समूह मिलने आया। उनमें से एक छात्र ने उनसे पूछा, आपने शादी क्यों नहीं की। अटलजी ने ठहाका लगाते हुए कहा, ‘यार जब शादी की उम्र थी, तब जिंदगी की मस्ती ने इस बारे में सोचने का मौका ही नहीं दिया। अब जब सोचता हूं तो कोई मिलती नहीं।’ छात्र काफी देर तक हंसते रहे। थोड़ी देर बाद जब ये विद्यार्थी लौटने को उठे तो अटलजी ने फिर उस छात्र से कहा- ‘यार! देखना, अगर कोई मिले तो जरूर बताना।’

टण्डन जी संघर्ष करो, हम आपके साथ हैं :  लालजी टंडन उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री थे और अटल जी लखनऊ से सांसद थे। गनेशगंज इलाके में पं. दीन दयाल उपाध्याय स्मारक के लिए भूमि तलाशी गयी। कुछ लोगों ने उसे अवैध तरीके से कब्जा कर रखा था। किसी तरह उसे खाली कराकर भूमि पूजन के लिए टंडनजी ने अटलजी को आने के लिए मना लिया। अटलजी आए और भूमि पूजन किया। कार्यक्रम सम्पन्न होने के बाद कुछ कार्यकर्ता लालजी टण्डन के लिए भी नारा लगाने लगे तो लालजी टंडन ने थोड़ा झेंपते हुए अटलजी की ओर देखा तो पाया नारा लगाने वालों में अटलजी भी थे। वह कह रहे थे, ‘टण्डन जी संघर्ष करो, हम आपके साथ हैं।’

शादी ही नहीं की…इसलिए स्वाद भी नहीं जानता :  लखनऊ में चौक की राजा ठंडाई के मालिक विनोद तिवारी दुकान पर बैठे ही थे कि अचानक अटल बिहारी वाजपेयी जी दुकान पर आ गए। उनके साथ लालजी टंडन, कलराज मिश्र और राजनाथ सिंह भी थे। तब उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह की सरकार थी। अटल जी किसी मुद्दे पर राजनाथ सिंह और कलराज मिश्र से बात कर रहे थे। तभी दुकान मालिक विनोद जी ने इशारे से पूछा कैसी… सादी? अटल जी ने पलट कर जवाब दिया – मैं और सादी! मैंने तो शादी ही नहीं की…इसलिए स्वाद भी नहीं जानता।

दादा जीत की बधाई :  वर्ष 1957 का चुनाव था। अटल बिहारी वाजपेयी जी लखनऊ से चुनाव लड़ रहे थे। उनके सामने थे कांग्रेस से पुलिन बिहारी बनर्जी ‘दादा’। बनर्जी चुनाव जीते और अटलजी हार गए। जनसंघ के कार्यालय पर मौजूद लोग हार-जीत का विश्लेषण कर रहे थे, अटल जी उठे और कुछ लोगों के साथ पहुंच गए बनर्जी के घर। अटल को घर के सामने देख दादा के घर मौजूद लोग हड़बड़ा गए। अटल जी बोले, ‘दादा जीत की बधाई। चुनाव में तो बहुत कंजूसी की लेकिन अब न करो, कुछ लड्डू-वड्डू तो खिलाओ।’

फूलकुमारी बुआ कहां रहती हैं :  1957 में लखनऊ में चुनाव लड़ने के दौरान अटल बिहारी वाजेपयी जी ने अपने सहयोगी चंद्र प्रकाश अग्निहोत्री जी से पूछा कि फूलकुमारी बुआ कहां रहती हैं। अग्निहोत्री जी बोले हमारे घर के पास। फूलकुमारी शुक्ल ग्वालियर में अटलजी के गुरु रहे त्रिवेणी शंकर वाजपेयी जी की बहन थीं। रात में बिना किसी को बताए अटल जी अग्निहोत्री जी के घर पहुँच गए।

उनको लेकर बुआ के घर पहुंचे। बुआ के पैर छुए और हालचाल पूछा। फूलकुमारी बुआ ने अटलजी की बातों का जवाब तो बाद में दिया। पहले वहां मौजूद सभी के पैर छूने का आदेश दिया। अटल जी ने लाइन से सबके पैर छुए चाहें बच्चा हो या बड़ा। कुछ लोगों ने उनका हाथ बीच में रोका तो बोले, ‘बुआ का आदेश है, पालन तो होगा ही।’

शवयात्रा में कोई गाड़ी से नहीं चलता : लखनऊ की वर्तमान मेयर संयुक्ता भाटिया के पति और तत्कालीन कैंट विधायक सतीश भाटिया की मृत्यु पर लखनऊ आए अटल बिहारी वाजपेयीजी शवयात्रा के साथ पैदल ही आलमबाग श्मशान घाट तक गए। अधिकारियों के लाख कहने पर भी उन्होंने सुरक्षा और गाड़ी लेने से इनकार कर दिया। अटल जी बोले, ‘शवयात्रा में कोई गाड़ी से नहीं चलता।’ वे तब तक श्मशान घाट पर भी बैठे रहे जब तक अंत्येष्टि पूरी नहीं हो गई।

वरिष्‍ठ पत्रकार संजय तिवारी के एफबी वॉल से साभार.