नैतिकता एवं सुचिता के रक्षक नेताजी और उनके दोस्‍त दरीलाल की दरी

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नेताजी

नेताजी और उनके जिगरी दोस्‍त दरी लाल जब राजनीति में आये, तब देश के हालात अच्‍छे नहीं थे। ऐसा इसलिये था कि वह विपक्षी दल में थे, और विपक्षी दल में रहते हुए देश के हालात अच्‍छे मान लेना पार्टी विरोधी गतिविधि मानी जाती। देश के हालात तभी अच्‍छे माने जा सकते थे, जब नेताजी की पार्टी सत्‍ता में आ जाती। खैर, नेताजी और दरी लाल गरीबी में पले-बढ़े थे, इसलिये गरीबों की चिंता इन्‍हें सबसे ज्‍यादा थी। दोनों ने तय किया कि अब उनका जीवन गरीबों को उनका हक दिलाने में खर्च होगा, और वे दोनों लोग अब गरीबी को खत्‍म करके ही मानेंगे।

दोनों ने गरीबों के लिये आंदोलन शुरू किये। दरी लाल जनता की हक में डीएम-एसपी कार्यालय के सामने धरना देते, आमरण अनशन करते, नेताजी फोटो खिंचाने के बाद राजधानी निकल लेते। बड़े नेताओं को पांव पखारते। किसी दूसरे का चावल अपनी खेत का बताकर प्रदेश अध्‍यक्षजी की सेवा करते। और गरीबों के लिये आंदोलन चलाने की जानकारी फोटो के साथ देते। इधर, अपने दरी लाल हमेशा दरी पर ही बैठे रहते। राजधानी कम जाते। अध्‍यक्षजी के लिये चावल भी नहीं ले जाते। और दरी पर बैठने का फोटो भी नहीं दिखाते।

नेताजी के जुझारू काम से खुश होकर प्रदेश अध्‍यक्षजी ने उन्‍हें जिला अध्‍यक्ष बना दिया। दरी लाल अब भी दरी पर जनता के लिये आंदोलन करते। नेताजी अब राष्‍ट्रीय राजधानी जाने लगे। राष्‍ट्रीय महामंत्री के पांव छूने लगे। बाजार का खरीदा घी अपने घर का बताकर उन्‍हें देने लगे। जनता की गरीबी खत्‍म करने का उनका संघर्ष भी काम आने लगा, अब नेताजी की झोपड़ी पक्‍के मकान में बदल गई। साइकिल ने अब कार का रुप धारण कर लिया। दरी लाल अब भी दरी पर ही संघर्ष कर रहे थे।

उनकी साइकिल पहले से भी पुरानी हो गई, लेकिन उन्‍हें बराबर उम्‍मीद थी कि उनकी पार्टी का शीर्ष नेतृत्‍व उनके संघर्ष को समझेगा और उन्‍हें इसका पुरस्‍कार भी देगा। दरी लाल की झोपड़ी भी इस बरसात चूने लगी थी, लेकिन वो अब भी जनता के लिये दरी पर बैठने से परहेज नहीं कर रहे थे। वो वैचारिक लड़ाई लड़ रहे थे। इधर, नेताजी के काम से खुश होकर उन्‍हें प्रदेश की कमेटी में शामिल कर लिया गया। नेताजी के संघर्षों को देखते हुए उन्‍हें पेट्रोल पंप और गैस एजेंसी का पुरस्‍कार भी राष्‍ट्रीय महामंत्री जी ने दिलाया। दरी लाल अब भी गरीबों के लिये दरी बिछाकर संघर्ष कर रहे थे।

प्रदेश पदाधिकारी बनने के बाद नेताजी राष्‍ट्रीय अध्‍यक्षजी के चरण स्‍पर्श करने लगे। व्‍यस्‍तता इतनी बढ़ गई कि अब प्रदेश अध्‍यक्षजी को पहुंचाया जाने वाला चावल समयाभाव के चलते राष्‍ट्रीय अध्‍यक्षजी को पहुंचने लगा। राष्‍ट्रीय महामंत्रीजी के कोटे वाला देसी घी भी राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष के कोटे में चला गया। नेताजी को धूर्त बताते हुए प्रदेश अध्‍यक्षजी ने चावल और राष्‍ट्रीय महामंत्रीजी ने देसी घी कर इंतजार करना छोड़ दिया। राष्‍ट्रीय अध्‍यक्षजी ने नेताजी के लगन देखते हुए उन्‍हें प्रदेश अध्‍यक्ष बना दिया।

दरी लाल अब भी दरी पर बैठकर गरीबों के हक में आवाज उठा रहे थे। नेताजी के प्रदेश अध्‍यक्ष बनने के बाद उनकी उम्‍मीद भी जगी। दरी लाल ने नेताजी से कहा, ”नेताजी अब तो आप प्रदेश अध्‍यक्ष बन गये हो, मुझे उम्‍मीद है कि अब कम से कम मुझे जिलाध्‍यक्ष की जिम्‍मेदारी तो दे ही दोगे, क्‍योंकि आपने मेरा संघर्ष देखा है। मेरी गरीबी देखी है।” पर नेताजी ने समझाया, ”दरी भाई अगर मैंने आपको जिलाध्‍यक्ष बना दिया तो लोग मेरे पर दोस्‍तवाद, साथीवाद, क्षेत्रवाद, भाई-भतीजावाद करने का आरोप लगायेंगे, जो नैतिक रूप से सही नहीं होगा. और आप तो जानते हैं कि मैं राजनीति में सूचिता और नैतिकता का कितना ख्‍याल रखता हूं। और लगातार इसकी कीमत भी चुका रहा हूं।”

दरी लाल मन में गंदी सी गाली देते हुए फिर से धरना देने पहुंच गये। इस घटना के एक सप्‍ताह बाद नेताजी ने जोशीला भाषण दिया। कहा, ”अब वक्‍त आ गया है कि देश का नेतृत्‍व युवाओं के हाथों में पहुंचे। युवा आगे आयेंगे तो पार्टी और देश दोनों मजबूत होगा।” इसके दो दिन बाद नेताजी के लड़के ने अपने पिताजी की फोटो के साथ सोशल मीडिया पर लिखा- ”मैं पिताजी की तरह मेहनत करके गरीब जनता और देश की सेवा करना चाहता हूं। देश से गरीबी मिटाना चाहता हूं।” अब नेताजी को घी और चावल पहुंचाने वालों ने नेताजी के लौंडे के स्‍टेटस पर नेताजी से मांग की कि अब छोटे नेताजी को नेतृत्‍व सौंपने का समय आ गया है।

दो दिन बाद नेताजी ने भाषण दिया, ”जनता और समर्थकों की बेहद मांग पर ना चाहते हुए भी मैं छोटे नेताजी को युवा संगठन का प्रदेश अध्‍यक्ष बनाता हूं। मैं राजनीति में नैतिकता और सुचिता के लिये सब कुछ न्‍यौछावर कर देने वाला शख्‍स हूं, लेकिन जनता-समर्थक मेरे लिये भगवान हैं और मैं भगवान की मांग को दरकिनार करने का साहस नहीं कर सकता, चाहे जान ही क्‍यों ना चली जाये। जनता और समर्थक मेरे लिये पूज्‍यनीय हैं, और इनकी बात को चाहते हुए भी अनसुना नहीं कर सकता।” भाषण खत्‍म होने के बाद नेताजी अपनी लक्‍जरी कार में बैठकर निकल गये और दरी लाल रैली की दरियां समेटवाने में जुट गये।

अनिल सिंह