नोटबंदी से देश को लगी 9 लाख करोड़ की चपत, आरबीआई का आकलन

कुमार समीर

नई दिल्‍ली : केंद्र में सत्तासीन मोदी सरकार ने आठ नवम्बर 2016 को रात आठ बजे जब अचानक नोटबंदी का फैसला लिया था तो उस समय किस तरह अफरातफरी मच गई थी, यह हम सभी को याद है । बैंकों के सामने वो लंबी-लंबी कतारें और फिर वहां से खाली हाथ लौटना, रोजमर्रा की जरूरतों तक पूरा नहीं कर पाना लेकिन इस सबके बावजूद देश की जनता का विचलित नहीं होना, बड़ी बात थी। और ऐसा संभव हुआ था केवल और केवल प्रधानमंत्री मोदी के भरोसे पर क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनसे केवल और केवल 50 दिन मांगे थे।

यानी साल 2016 के आठ नवम्बर से 30 दिसम्बर तक का समय। तब प्रधानमंत्री ने भरोसा दिलाया था कि अगर 30 दिसम्बर के बाद कोई कमी रह जाए, कोई मेरी गलती निकल जाए, कोई मेरा गलत इरादा निकल जाए तो आप जिस चौराहे पर मुझे खड़ा करेंगे मैं खड़ा होंऊंगा और देश जो भी सजा तय करेगा, वो सजा भुगतने को तैयार रहूंगा। लेकिन अब एक साल नौ महीने के बाद फैक्ट्स के साथ सवाल उठाए जा रहे हैं कि क्या मोदी के नोटबंदी से जुड़े लगभग सभी दावे फुस्स हो गए हैं, दावों की हवा निकल गई है ?

देश को इससे क्या फायदा हुआ ये सवाल आम लोगों के साथ-साथ सियासी गलियारों में भी उठने शुरू हो गए हैं ? पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने तो यहां तक कह दिया है कि नोटबंदी एक ऑर्गेनाइज्ड (संगठित) लूट, लीगलाइज्ड प्लंडर (कानूनी डाका) है। हवा हवाई आंकड़े वास्तविक आंकड़े के सामने टिक नहीं सकते, यह तो होना ही था।

हालांकि इसमें दो राय नहीं नोटबंदी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल के चुनिंदा प्रमुख फैसलों में से एक नोटबंदी रहा है और इस पर देश की जनता का उन्हें भरपूर साथ भी मिला। लोगों ने उस दौरान कष्ट सहे लेकिन चूं तक नही बोला पर अब जिस तरह की विपरीत रिपोर्टें नोटबंदी को लेकर सामने आ रही हैं उससे नोटबंदी के फैसले पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। सियासी गलियारें में विपक्ष हमलावर है तो सत्तापक्ष की तरफ से नोटबंदी की कामयाबी को लेकर कोई दमदार दलील अब तक सामने नहीं आई है।

वहीं देखा जाए तो उस वक्त प्रधानमंत्री मोदी ने नोटबंदी के चार मकसद बताए थे। इनमें आतंकवाद, कालाधन और भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के साथ-साथ डिजिटल ट्रांजेक्शन को बढ़ावा देना शामिल था। लेकिन आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो इनमें से तीन तो पूरी तरह से विफल जबकि चौथा आंशिक रूप से ही सफल साबित हुए हैं।

नोटबंदी से आतंकवाद पर लगाम लगने का दावा किया गया था लेकिन ऐसा नहीं हुआ। असम में आठ नवम्बर 2015 से नवम्बर 2016 तक 155 बड़ी आतंकी घटनाएं हुईं, इसके बाद 2017 तक 184, और 31 जुलाई 2018 तक 191 आतंकी घटनाएं हो चुकी हैं। वहीं कालाधन पर दावा किया गया था कि ढाई साल में 1.2 लाख करोड़ रुपए कालाधन बाहर आया और आने वाले वक्त में 3-4 लाख करोड़ रुपए और कालाधन वापस आने का दावा किया गया था लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

सच तो ये है कि 99.3 फीसदी पुराने नोट वापस आ चुके हैं और जो नहीं आए हैं, उन्हें भी सरकार पूरी तरह कालाधन नहीं मान रही है क्योंकि पड़ोसी देशों नेपाल, भूटान में पुरानी करेंसी ही चल रही हैं। बता दें कि नोटबंदी के ऐलान के वक्त पांच सौ और हजार के 15.41 लाख करोड़ रुपए के नोट चलन में थे जिनमें से 15.31 लाख करोड़ रुपए बैंक में वापस जमा हुए हैं। ये रुपए कुल करेंसी के 86 प्रतिशत हैं जो नोटबंदी के फैसले के बाद चलन से बाहर हो गए।

नोटबंदी लगाए जाने के दो सप्ताह बाद तत्कालीन अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कहा था कि सरकार ने यह कदम उत्तर पूर्व और कश्मीर में भारत के खिलाफ आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए इस्तेमाल कर रहे 4-5 लाख करोड़ रुपए तक के चलन में बाहर करने के लिए उठाया गया है। लेकिन हुआ क्या, उन चार से पांच लाख तक के नोट चलन से बाहर होने की जगह बैंकिंग सिस्टम में वापस आ गए। अब वित्त मंत्री अरुण जेटली की तरफ से बयान दिया जा रहा है कि कितना पैसा वापस आएगा, ये नोटबंदी का मकसद नहीं था। कितना विरोधाभास है अटॉर्नी जनरल और वित्त मंत्री के बयान में।

इतना ही नहीं, नोटबंदी के वक्त भ्रष्टाचार को दीमक बताते हुए दावा किया गया था कि अंकुश लगाने के लिए नोटबंदी जैसे सख्त कदम उठाना जरूरी हो गया था लेकिन इसका हकीकत में असर भी नहीं दिखा। हाल ही में ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट में भ्रष्ट देशों की सूची में जहां भारत 2016 में 79वें नम्बर पर था वहीं 2017 में 81वें नम्बर पर पहुंच गया। रॉफेल डील पर सरकार पर अंगुली उठ रही है। विपक्ष जहां रोजाना नए-नए सवाल कर रहा है वहीं फ्रांस की मीडिया ने भी इस डील पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं कि 2007 में शुरू हुई डील से 2015 में सरकारी कंपनी हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) की जगह अंबानी के रिलायंस डिफेंस को कैसे मिली डील ?

इसी तरह नोटबंदी से डिजिटल ट्राजेक्शन को बढ़ावा मिलने का दावा किया गया था और ऐसा हुआ भी। 2016 के मुकाबले 2017 में डिजिटल पेमेंट की राशि 40 प्रतिशत तक बढ़ी और जुलाई 2018 तक इसमें पांच गुना तक बढ़ोतरी हुई। हालांकि तब नोटबंदी को कैशलेस इकोनॉमी के लिए जरूरी कदम बताया गया था लेकिन नोटबंदी के पौने दो साल बाद रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक लोगों के पास मौजूदा समय में सबसे ज्यादा नकदी है। रिजर्व बैंक के मुताबिक 9 दिसम्बर 2016 को आम लोगों के पास 7.8 लाख करोड़ रुपए थे जो जून 2018 तक बढ़कर 18.5 लाख करोड़ तक पहुंच गया। यानी नोटबंदी के समय से नकदी लगभग दोगुनी हो गई।

जाली नोटों के चलन पर भी अंकुश नहीं लग पाया। रिजर्व बैंक के मुताबिक 2017-18 में 500 के 9,892 नोट और 2000 के 17,929 नोट पकड़े गए। ये सभी जाली नोट थे। इसके अलावा नोटबंदी से फायदे से उलट इसे लागू करने में रिजर्व बैंक को हजारों करौड़ का नुकसान अलग से उठाना पड़ा। नए नोटों की प्रिटिंग के लिए रिजर्व बैंक को 7,965 करोड़ रुपए खर्च करने पड़े। इसके अलावा नकदी की किल्लत नहीं हो इसलिए ज्यादा नोट बाजार में जारी किए गए, इस कारण 17,426 करोड़ रुपए का ब्याज भी अलग से चुकाना पड़ा। इसके साथ साथ देश भर के एटीएम को नए नोटों के हिसाब से तैयार करने में भी करोड़ों रुपए खर्च हुए।

इतना ही नहीं नोटबंदी से देश की आर्थिक विकास दर की गति पर भी असर पड़ा है। 2015-16 के दौरान जीडीपी की ग्रोथ रेट 8.01 प्रतिशत के आसपास थी जो 2016-17 के दौरान 7.11 फीसदी पर पहुंच गई। इतना ही नहीं 2017-18 के छमाही  तक जीडीपी की ग्रोथ रेट 6.1 फीसदी पर आ गई। उधर नीति आयोग ने कम आर्थिक विकास दर के लिए आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया है। नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार के मुताबिक रघुराम राजन की नीतियों की वजह से सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) पर असर पड़ा है।

कुमार ने कहा कि विकास दर के घटने की एक बड़ी वजह यूपीए सरकार द्वारा दिए गए लोन के कारण बैंकिंग क्षेत्र का बढ़ता एनपीए है ना कि नोटबंदी। नोटबंदी के कारण विकास दर के घटने की चर्चा पर कुमार का कहना है कि इस तरह की बातें बिल्कुल गलत हैं। वहीं वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने पलटवार करते हुए कहा कि एनडीए सरकार ने कितना कर्ज दिया है और उनमें से कितनी राशि डूब गई। इसका खुलासा किया जाना चाहिए।

उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से एनडीए सरकार के दौरान दिए गए उन कर्जों का खुलासा करने की मांग की, जो गैर-निष्पादित संपत्ति (एनपीए) में तब्दील हो चुके हैं। चिदंबरम ने कहा, सही परीक्षण यह है कि क्या एनडीए-2, यूपीए-2 और यूपीए-1 की सरकार के रिकॉर्ड की तुलना कर सकता है, हम मान लें कि प्रधानमंत्री जो कहते हैं कि यूपीए के कार्यकाल में कर्ज फंस गया। एनडीए में कितने कर्जो का नवीकरण किया गया या समझौता किया गया, बताया जाए। सब कुछ दूध का दूध , पानी का पानी हो जाएगा।

हालांकि सरकार की तरफ से कुछ क्षेत्रों का जिक्र कर जीडीपी की ग्रोथ रेट आठ फीसदी से ऊपर का भी दावा करने की कोशिश की गई लेकिन पूर्व वित्त मंत्री पी चिदम्बरम का कहना है कि आंकड़े की कलाबाजी से अब काम नहीं चलने वाला है। जनता समझ रही है। उन्होंने तो खुलकर कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था के टर्म में 1.5 फीसदी का नुकसान हुआ जिसका सीधा-सीधा मतलब निकलता है कि एक साल में 2.5 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। वित्त मामलों की पार्लियामेंटरी स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट में भी नोटबंदी के कारण देश की अर्थव्यवस्था की ग्रोथ 1 फीसदी कम होने की बात कही गई है।

नोटबंदी से रोजगार पर भी बुरा असर पड़ा है। बेरोजगारों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनामी के कंज्यूमर पिरामिड हाउस होल्ड सर्विस के आंकड़े के मुताबिक 2016-17 के अंतिम तिमाही में करीब 15 लाख नौकरियां गई। भाजपा के सहयोगी संगठन भारतीय मजदूर संघ ने भी नोटबंदी पर कहा कि असंगठित क्षेत्र की ढाई लाख यूनिटें बंद हो गई और रियल एस्टेट सेक्टर पर भी बुरा असर पड़ा है।

बड़ी संख्या में नौकरियां गंवाई हैं। यानि नोटबंदी से नुकसान की लंबी फेहरिस्त है वहीं नोटबंदी से एक फायदा जरूर दिख रहा है और वह टैक्स भरने वाले लोगों की संख्या में बढ़ोतरी के रूप में सामने आया है। 2017-18 के इकोनामिक सर्वे के मुताबिक नोटबंदी के बाद देशभर में टैक्स भरने वालों की संख्या में 18 लाख की बढ़ोतरी हुई है। अब सरकार इसे ही कामयाबी मानें और कमियों, नुकसान को नजरंदाज करे तो क्या किया जा सकता है ? कुछ सवालों के जवाब सरकार की तरफ से मिले तो काफी हद तक नोटबंदी पर उठने वाले सवालों के जवाब मिल सकते हैं।

मसलन नोटबंदी के बाद जनधन खातों की संख्या में बड़ा इजाफा हुआ था। नोटबंदी के बाद पहले महीने में ही इन खातों में कुल जमा 456 अरब से उछलकर 746 अरब पर पहुंच गया था। क्या अब इन खातों की जांच रिपोर्ट जनता के सामने लाने की जरूरत नहीं है?

इसी तरह नोटबंदी के ऐलान के बाद केन्द्र सरकार, राज्य सरकार और देशभर में सरकारी कंपनियों पर नोटबंदी के प्रतिबंध काम नहीं कर रहे थे? क्या देश को अब यह पता नहीं चलना चाहिए कि नोटबंदी के दौरान सरकारी विभागों और कंपनियों में नकदी का संचार किस तरह रहा और इन विभागों के जरिए सरकारी खजानों में कितनी प्रतिबंधित करेंसी वापस लौटी है?

इसी तरह क्या यह जरूरी नहीं कि देश को पता चले कि उनके राजनीतिक दलों ने कितनी बड़ी मात्रा में प्रतिबंधित करेंसी को बैंक में पहुंचाने का काम किया और उसके ऐवज में नई करेंसी प्राप्त की। इसके अलावा बैंकों की बैलैंसशीट व कॉरपोरेट घरानों के खातों की जांच से सचाई सामने आ सकती है? सब कुछ सरकार पर निर्भर करता है।

लेखक कुमार समीर वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. सहारा, नई दुनिया, फोकस टीवी समेत कई अन्‍य संस्‍थानों में भी वरिष्‍ठ पदों पर रह चुके हैं.