लोकप्रिय होता एक नया खेल, मीटू यानी खेल पगड़ी उछाल का

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राज बहादुर सिंह

: 18 साल की उम्र में कथित उत्पीड़न का दावा और 64 साल की उम्र में इसका प्रकटीकरण : लखनऊ : मी टू। यह है क्या? क्या मिल रहा है इससे? कुछ गुमनामी में पड़े लोगों को सुर्खियों में आने का मौका? या फिर कई अन्य मसलों और विषयों की तरह हम एक और मामले में पश्चिम का अंधानुकरण कर रहे हैं। प्रगतिवाद और नारी सशक्तीकरण के नाम पर इस अभियान को हवा देने वाले ऐसी चिंगारियां उड़ा रहे हैं जो पता नहीं आगे क्या गुल खिलाएगी।

कुछ दिन पहले 75 साल के अभिनेता जितेंद्र के मामा की लड़की ने उन पर 46 साल पहले यौन उत्पीड़न की शिकायत करने की एफआईआर करा दी। प्राथमिकी की भाषा भी गजब की थी। पढ़ने वाला और लिखने वाला तो शर्मा जाए अलबत्ता लिखवाने वाले का यो पता नहीं। इतने साल पहले की कथित घटना को इतने सालों तक छुपा कर रखने की क्या वजह हो सकती है, यह सोचने की बात है।

18 साल की उम्र में कथित उत्पीड़न का दावा और 64 साल की उम्र में इसका प्रकटीकरण। अगर आत्मा 46 तक सोयी रही तो फिर आज इसके जागने का न तो औचित्य है और न आवश्यकता। ऐसी आत्मा को तो मृतप्राय ही रहना चाहिए। आज उसका जागना अच्छी खासी जगहंसाई का सबब भी बन सकती है या बन भी जाती है।

तर्क कुतर्क कितने ही गढ़ लिए जाएं लेकिन अन्याय, अत्याचार व उत्पीड़न का प्रतिकार अगर तत्काल या एक रीजनेबल टाइम के भीतर नहीं होता तो इसकी प्रासंगिकता और प्रमाणिकता दोनों धूमिल होती जाती हैं। अगर एक बार किसी ने चालाकी, धोखे या पाखंड से उत्पीड़न कर लिया तो फिर उसके बाद सालों तक इस सिलसिले के जारी रहने को सालों बाद उत्पीड़न कहना दरअसल सिक्के के सिर्फ एक पहलू को देखना और उससे एक सुनियोजित सहानुभूति रखना ही कहा जाएगा।

दरअसल मी टू अभियान पगड़ी उछालने का एक सस्ता और सुलभ माध्यम बन कर उभरा है। सालों साल पहले हुई कथित घटना को लेकर जांच एजेंसी (मुख्य रूप से पुलिस) किसी ठोस नतीजे पर भले ही न पहुंचे, लेकिन उत्पीड़क और पीड़ित दोनों को ही एक्सप्लॉयट करने का सुनहरा अवसर उसे जरूर मिल जाता है।

गनीमत है अभी जीवित व्यक्तियों की ही ओर ध्यान गया है। कहीं ऐसा न हो कि कोई अत्यंत ‘बोल्ड’ पीड़ित को दुनिया से कूच कर चुके किसी की कारगुजारी याद आए और फिर पता नहीं किस लोक में उसकी जांच और ट्रायल शुरू हो जाए। लेकिन कदाचित ऐसा न भी हो क्योंकि मृत व्यक्ति से तो कोई निगोशिएशन हो नहीं पाएगा, अलबत्ता उसके वारिसों से हो सकता है अगर उन्हें अपने पूर्वजों की पगड़ी न उछलने देने की फिक्र होगी तो।

अभी तो बस शुरू हुआ है। अभी जोर पकड़ेगा। जैसे जैसे लोकप्रियता बढ़ेगी वैसे वैसे नए-नए पीड़ित और उत्पीड़क सामने आएंगे। और रोमांचक मैच खेले जाएंगे जिसमें समाज (जो फिलहाल सोशल मीडिया नामक तोते में सिमटा माना जाता है) अम्पायर की भूमिका निभाएगा।rbs

राज बहादुर सिंह उत्तर प्रदेश के जाने माने पत्रकार हैं. हिंदी-अंग्रेजी पर समान पकड़ रखते हैं. दैनिक जागरण समेत कई बड़े संस्थानों में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं. सियासत, फिल्म और खेल पर जबरदस्त पकड़ रखने वाले श्री सिंह फिलहाल पायनियर में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं. उनका लिखा फेसबुक से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.