मोदी सरकार कर रही सोशल मीडिया पर पहरेदार बैठाने की तैयारी

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कुमार नरेंद्र सिंह

: सरकार लोगों को डराकर रखना चाहती है : सोशल मीडिया की आजादी मोदी सरकार को अब रास नहीं आ रही है औऱ इसीलिए वह उसे लगाम लगाने की कोशिश में जुटी हुई है। यह अलग बात है कि 2014 के आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की जीत में सोशल मीडिया की एक बड़ी भूमिका रही थी। वैसे आज भी एक पार्टी के रूप में सोशल मीडिया का सबसे ज्यादा उपयोग भाजपा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ही करते हैं। लगता है कि सोशल मीडिया की शक्ति का अब उन्हें असली एहसास हुआ है।

यही कारण है कि केंद्र सरकार एक सोशल मीडिया विश्लेषणात्मक उपकरण तैनात करना चाहती है, जो नागरिकों की डिजिटल प्रोफाइल बनाएगी, ताकि सरकारी नीतियों के बारे में नागरिकों की राय और उनकी प्रतिक्रिया को भांपा जा सके। सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा जारी निविदा पत्र के अनुसार इसके माध्यम से प्राप्त सूचना का इस्तेमाल सरकारी योजनाओं एवं कार्यक्रमों के बारे में लोगों में सकारात्मक विचारों को बढ़ावा देने एवं नकारात्मक भावनाओं को दूर करने के लिए करेगी।

निविदा पत्र बताता है कि उपकरण को ट्वीटर, यूट्यूब, इन्स्टाग्राम, वाट्सऐप, फेसबुक और ब्लॉग्स जैसे डिजिटल मंचों की निगरानी करने में सक्षम होना चाहिए। इसके अलावे उसे ईमेल की निगरानी करने में भी सक्षम होना जरूरी बताया गया है। इस उपकरण का इस्तेमाल सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा स्थापित किया जानेवाला सोशल मीडिया कम्युनिकेशन हब करेगा। चूंकि भारत में फिलहाल डाटा की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कोई कानून नहीं है या उस डाटा को इस्तेमाल करने से पहले लोगों की राय जानने की प्रक्रिया परिभाषित नहीं है, इसलिए निजता को लेकर शंका उठना स्वाभाविक ही था। कहे बिना भी स्पष्ट है कि इसी शंका ने महुआ मोयत्रा को सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल करने के लिए प्रेरित किया।

अब सरकार भले ही दलील दे कि उसका उद्देश्य राष्ट्रवाद को बढ़ावा देना और सोशल मीडिया से उत्पन्न गड़बड़ियों को रोकना है, लेकिन यह समझना किसी के लिए भी कठिन नहीं है कि इसके पीछे सरकार की वास्तविक मंशा क्या है। इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी बहुत महत्वपूर्ण है कि सोशल मीडिया की वैयक्तिक निगरानी देश को एक निगरानी राज्य में तब्दील कर देगी।

यदि कहा जाए कि इस टिप्पणी के जरिए उच्चतम न्यायालय ने आम लोगों की धारणा को ही संपुष्ट किया है, तो शायद गलत नहीं होगा। अकारण नहीं कि उसने सरकार को अपनी बात रखने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है, ताकि 20 अगस्त से पहले सुनवाई हो सके। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के उत्साह को कम तो जरूर किया है, लेकिन कोई यह न समझे कि वह सोशल मीडिया की निगरानी से जल्दी पीछे हट जाएगी।

सरकार का कहना है कि उसकी मंशा लोगों की भावनाओं और प्रतिक्रियाओं की निगरानी करना नहीं है, लेकिन क्या सचमुच? अगर यह निगरानी नहीं है, तो फिर निगरानी क्या होती है। किसी का व्यक्तिगत संदेश पढ़ना निगरानी नहीं, तो और क्या है? यदि सोशल मीडिया के उपयोगकर्ता को मालूम हो कि सरकार उसके संदेश की निगरानी कर रही है, तो उसे डराने के लिए यह पर्याप्त है। वास्तव में यह उसके संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार का उल्लंघन है।

वैसे सच भी यही है कि सरकार लोगों को डराकर रखना चाहती है, ताकि वे उसकी नीतियों और कमियों की आलोचना करने से बचें। सरकार की नीतियों और कार्यों की आलोचना करना भारतीय नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है, जिसे मोदी सरकार छीन लेने पर आमादा है। मोदी सरकार का यह उपक्रम सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ है, जिसमें उसने निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार करार दिया था।

सरकार कहती है कि उसका यह उपक्रम निजता के अधिकार का हनन नहीं है, क्योंकि उनका संदेश तो पहले से ही सार्वजनिक रहता है। सरकार का यह तर्क वास्तव में कुतर्क है, क्योंकि कोई उपयोगकर्ता अपना संदेश ऑनलाइन सार्वजनिक करता भी है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि उस सूचना पर निजता का उसका अधिकार खत्म हो जाता है, भले ही वह सूचना किसी खास उद्देश्य से साझा किया गया हो।

यह सचमुच विचित्र लगता है कि मंत्रालय ने ईमेल की निगरानी करने के लिए उपकरण मांगा है, क्योंकि कानूनी रूप से फिलहाल ईमेल की निगरानी की अनुमति केवल सुरक्षा और अपराध की जांच-पड़ताल के लिए ही है और वह भी गृह मंत्रालय की मंजूरी के बाद। अजीब तो यह भी है कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने अभी तक यह भी नहीं बताया है कि वह निगरानी से प्राप्त सूचनाओं का किस तरह इस्तेमाल करेगा।

दरअसल, सरकार की मंशा न तो राष्ट्रवाद को बढ़ाव देना है और न अपने कार्यों व नीतियों के संबंध में सही जानकारी देना, जैसा कि वह कह रही है। उसका एकमात्र उद्देश्य है सरकार की आलोचना करनेवालों का मुंह बंद करना, उन्हें भयभीत करना और अगले चुनाव में अपनी जीत सुनिश्चित करना। इस बात से शायद ही किसी को इनकार हो कि सरकार नकारात्मक प्रचार करनेवालों की पहचान कर उन्हें प्रताड़ित करेगी।

कई जगहों पर ऐसा हो भी चुका है, जब किसी मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की आलोचना करने के लिए अनेक लोगों के खिलाफ केस दर्ज किए गए और उन्हें अनेक प्रकार से प्रताड़ित किया गया। अभी तो सरकार के पास ऐसा उपकरण नहीं है, तब तो लोगों को इतना भयभीत किया जा रहा है। जब कानूनी रूप से निगरानी मान्य हो जाएगा, तो समझना कठिन नहीं कि तब क्या होगा। यदि सरकार अपने मकसद में कामयाब हो जाती है, तो फिर सोशल मीडिया का कोई अर्थ ही नहीं रह जाएगा और निजता का अधिकार महज एक मजाक बनकर रह जाएगा।

भारत एक लोकतांत्रिक देश है और देश के नागरिकों को संविधान ने निजता का अधिकार भी दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस अधिकार को मौलिक अधिकार का दर्जा दिया है। लेकिन मोदी सरकार को न तो लोकतंत्र का कोई खयाल है और न संविधान का। सच तो यह है कि मोदी सरकार यह सारा कवायद केवल अगले आम चुनाव में अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए कर रही है। वह अपनी धूमिल होती छवि को और धूमिल होने देना नहीं चाहती। अब तो वह अखबारों के हेडलाइन्स भी तय करेगी, ताकि उसकी छवि नकारात्मक न हो।

बहरहाल, सोशल मीडिया को लगाम लगाने की उसकी कोशिश कभी सफल नहीं होगी, क्योंकि भारतवासियों को आजादी पर प्रतिबंध स्वीकार नहीं होगा। यह कैसी विडंबना है कि एक तरफ मोदी और उनकी सरकार इमर्जेंसी के दौरान हुए लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन को लेकर देशभर में सेमिनार आयोजित कर रही है और जेल जानेवालों को माला पहना रही है, दूसरी तरफ स्वयं इमर्जेंसी जैसे हालात तैयार कर रही है। उसके इस दोहरे रवैये की केवल आलोचना ही की जा सकती है और जरूरत पड़ने पर संघर्ष भी। हम अपने लोकतांत्रिक अधिकारों को किसी भी सरकार के पास गिरवी नहीं रख सकते, क्योंकि एक तरह से यह देश को ही गिरवी रखने जैसा होगा।kumar

कुमार नरेंद्र सिंह वरिष्‍ठ एवं देश के जानेमाने पत्रकार हैं। हिंदी, अंग्रेजी और भोजपुरी भाषा पर समान पकड़ रखने वाले श्री सिंह कई किताबें भी लिख चुके हैं। वह राष्‍ट्रीय सहाराहमार टीवीनई दुनिया समेत कई संस्‍थानों में वरिष्‍ठ पद पर काम कर चुके हैं। फिलहाल वह पाक्षिक पत्रिका लोक स्‍वामी के संपादक के तौर पर काम कर रहे हैं।