…तब पुलिस ने इस महिला के गुप्तांग में पत्थर भर दिए थे

कुमार नरेन्द्र सिंह

: यह सरकार का पैदा किया मर्ज है : हाल ही में पांच नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के बाद नक्सलवाद एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। पुलिस ने माओवादियों से उनके संबंध होने का आरोप लगाया है। वैसे यह कोई पहला मौका नहीं है, जब माओवादियों से संबंध होने के आधार पर नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया है। इसके पहले भी दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर साईं बाबा व अन्य कई लोगों को इस आरोप में गिरफ्तार किया गया था। इन्हें शहरी माओवादी बताया जा रहा है।

सरकार का दावा है कि मोदी के सत्ता में आने के बाद नक्सली हमलों में प्रत्यक्ष कमी आयी है। वैसे पूरवर्ती सरकारें भी यही दावा करती रही थीं। सरकारों के इस दावे के विपरीत सच्चाई यह है कि 1967 में दार्जिलिंग जिले के एक अनाम गांव नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ नक्सलवादी आंदोलन आज देश के अनेक राज्यों में फैल चुका है और लगातार फैलता जा रहा है। पुलिस और अर्द्ध सैनिक बलों की सारी कार्रवाइयां उनके प्रसार को रोकने में नकाम ही रही हैं।

ऐसे में सवाल उठता है कि सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद नक्सलवादी आंदोलन क्यों फैलता जा रहा है? आखिर क्या बात है कि हाशियो पर पड़े समूह सरकार से ज्यादा नक्सलवादियों को अपना हितैषी मानते हैं और उसे समर्थन देते हैं? नक्सलवाद के लगातार प्रसार के लिए यदि किसी को उत्तरदायी ठहराया जा सकता है, तो वह इस समस्या के प्रति सरकार का दृष्टिकोण और उसकी कार्यशैली है।

सरकार ने शुरू से ही नक्सलवाद को कानून-व्यवस्था की समस्या मानकर जहां निदान और उपचार करती रही, वहीं आंदोलन के मुद्दों को नजरअंदाज करती रही। यदि सरकार ने नक्सलवादियों द्वारा उठाए गए मुद्दों के समाधान की कोशिश करती, तो आज नक्सलवाद भारतीय राष्ट्र-राज्य को चुनौती देने की स्थिति में नहीं पहुंचता। लेकिन सरकार उन मुद्दों से मुंह चुराती रही, जिसका समाधान न केवल नक्सलवाद को पराजित कर सकता था, बल्कि देश को प्रगति के पथ पर आगे ले जाने के लिए भी जरूरी था। इसे समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे चलना होगा और हमें देखना होगा कि किन मुद्दों को लेकर नक्सलवादी आंदोलन की नींव पड़ी।

नक्सलवादी आंदोलन की शुरुआत तीन मांगों को लेकर हुयी थी – निम्नतम मजदूरी सुनिश्चित करना, हदबंदी से फाजिल जमीन भूमिहीनों में बांटना और महिलाओं की मर्यादा कायम रखना। इन तीन मांगों में ऐसा कुछ नहीं था, जो सरकार को नागावार गुजरने वाला था। कायदे से तो सरकार को चाहिए था कि वह त्वरित ढंग से इन तीनों मांगों को मान लेती और उसका परिपालन सुनिश्चित करने की कोशिश करती, क्योंकि ये तीनों काम सरकार के ही हैं।

लेकिन सरकार ने उनकी इन मांगों को मानने और उसका परिपालन सुनिश्चित करने के बदले आंदोलन का ही दमन करने में जुट गयी। बड़े पैमाने पर कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के अलावा सैकड़ों लोगों को पुलिसिया कार्रवाई में अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। कहने की आवश्यकता नहीं कि सरकार की नजर में आंदोलन में शामिल लोग राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं, बल्कि अपराधी गिरोह थे और यही कारण है कि उनके साथ अपराधियों जैसा सलूक करना ही वाजिब समझा गया।

यदि नक्सलवादी आंदोलन पर दृष्टिपात करें, तो कतिपय तथ्य स्पष्ट नजर आते हैं। जिन राज्यों में माओवादी आंदोलन का जोर है, वहां मानव विकास सूचकांक बहुत नीचे है यानी मानव विकास की कमी है। इससे उन इलाकों में रहनेवाले लोगों के मन में गुस्सा पैदा होता है, वे अपने को तिरस्कृत महसूस करते हैं और व्यवस्था से उनका विलगाव होता है। इसके अतिरिक्त स्थानीय रसूख वाले लोग आदिवासियों का शोषण ही नहीं करते, बल्कि आदिवासियों पर अनेक तरह के अत्याचार भी करते हैं। यह जानने के लिए किसी शोध की आवश्यकता नहीं है कि अधिकांश नक्सली समर्थक आदिवासी और दलित समूहों से आते हैं।

उल्लेखनीय यह भी है कि दलित और आदिवासियों की सम्मिलित आबादी देश की आबादी की एक चौथाई है और आधिकांश ग्रामीण इलाकों में रहते हैं। हिंसक नक्सलवादी आंदोलन को समर्थन देने के उनके कई कारण हैं। इन समूहों में सबसे ज्यादा बेरोजगारी है और शिक्षा का स्तर भी काफी निम्न है यानी उनके बीच शिक्षा और रोजगार दोनों की भारी कमी है। नयी वन नीतियों के चलते उनके सामने जीविका का संकट आ खड़ा हुआ है, क्योंकि वन के साधनों के उनके इस्तेमाल को नियंत्रित कर दिया गया है।

आदिवासियों को यह भी मालूम नहीं है कि वे वन के किन साधनों का इस्तेमाल करने के लिए स्वतंत्र हैं। प्रकृतिक साधनों तक उनकी पहुंच सीमित और नियंत्रित है। इसी तरह उनका सांस्कृतिक अपमान रोजमर्रा की बात बनकर रह गयी है। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधा आज भी उनकी पहुंच से बहुत दूर है। इसके अलावा स्थानीय रसूखदारों और सरकारी कर्मचारियों द्वारा उनका सामाजिक और आर्थिक शोषण बदस्तूर जारी है।

विस्थापन की पीड़ा भी सबसे ज्यादा वही झेल रहे हैं। विकास की हर कवायद उनके लिए मुसीबत लेकर आती है। मालूम हो कि 1947 से लेकर सन् 2000 तक विस्थापित होनेवालों में 80 प्रततिशत आदिवासी ही हैं। पुनर्वास की सरकारी नीति उनके लिए किसी मृग-मरीचिका ही साबित हुयी है। दुर्भाग्य यह कि अपनी इन पीड़ाओं को आवाज देने के लिए जब वे प्रतिरोध करते हैं, तो उनका दमन किया जाता है और इस प्रक्रिया में वे राजनीतिक रूप से हाथिये पर धकेल दिये जाते हैं।
जिन राज्यों में नक्सलवादी आंदोलन का जोर है, वहां वंचित समूहों के खिलाफ होनेवाले अत्याचार और हिंसा का ग्राफ भी काफी ऊंचा है। न तो सरकारी नौकरियों में उनके लिए पर्याप्त जगह बनाने की कोशिश की गयी और न विकास के किसी प्रयास में उनकी गिनती की गयी। इसे एक उदाहरण के जरिये ज्यादा ठोस तरीके से समझा जा सकता है।

आदिवासी इलाकों में दर्जनों बड़े-बड़े शहर बसाए गए। रांची, राउरकेला, भिलाई, रायपुर, जमशेदपुर आदि दर्जनों शहर बसाए गए, लेकिन किसी भी शहर में आदिवासियों के लिए कोई जगह मुहैया नहीं करायी गयी। आज इन शहरों में आदिवासियों की उपस्थिति नगण्य है। आखिर कहां गए वे आदिवासी, जो अब तक वहां रहते रहे थे। आखिर यह कैसा विकास है, जो अपने मूल निवासियों से ही बेपरवाह है। इसके अलावा राज्य के कर्मचारियों, विशेषकर वन अधिकारियों ने उनका जीना मुहाल कर दिया।

जब राज्य और स्थानीय दबंगों के खिलाफ आदिवासियों ने मोर्चा खोला, तो राज्य की मशीनरी उनकी सहायता करने के बदले उनका ही दमन करने लगी। चूंकि हमारे समाज में दलितों और आदिवासियों के खिलाफ शोषण और हिंसा की संरचनात्मक स्थितियां मौजूद हैं, इसलिए उनकी पीड़ा और शोषण को स्वाभाविक मान लिया गया। अपनी पीड़ा लेकर जब वे सरकारी अधिकारियों के पास जाते हैं, तो बहुधा उनकी कोई सुनवाई नहीं होती, बल्कि कई बार उन्हें वहां और भी अपमानित होना पड़ता है। दूसरे शब्दों में न्याय पाना तो दूर, उल्टे उन्हीं के खिलाफ केस बना दिया जाता है। इतना ही नहीं, उनके लिए जल्दी कोई जमानत देनेवाला भी नहीं मिलता और वे वर्षों जेल में पड़े रहते हैं।

आज हालत यह है कि यदि वे जंगल से सूखी लकड़ी भी बटोरते हैं, तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाता है। पुलिस और अन्य सरकारी कर्मचारी माओवादियों के खिलाफ अभियान की आड़ में उनकी बहन-बेटियों की इज्जत पर हाथ रख देते हैं। ऐसी कहानियां हम रोज ही अखबारों में पढ़ते रहते हैं। सोनी सोरी का मामला कौन नहीं जानता कि आदिवासियों के अधिकारों की लड़ाई लड़ने के चलते पुलिस ने उनके गुप्तांग में पत्थर डाल दिए थे। छत्तीसगढ़ में अनेक पत्रकारों को माओवादियों के साथ संबंध होने के झूठे आरोप में जेलों में डाल दिया गया।

अगर सरकारें नक्सलवादी समस्या को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानकर नहीं चलती, तो अब तक माओवादी हिंसा से काफी हद तक निजात मिल सकती थी। बताते हैं कि एक बार जब सरकार के नुमाइंदे माओवादियों से बातचीत करने के लिए उनके पास गयी, तो नक्सली नेताओं ने सत्ताधारी दल के अनेक चुनाव घोषणा पत्र दिखाए और कहा कि इन घोषणाओं को लागू कर दीजिए, हम अभी बंदूक फेंक देंगे।

इसके बाद कहने की आवश्यकता नहीं रह जाती कि माओवादी हिंसा में इजाफा और उनके प्रसार के लिए मूल रूप से सरकारी नीतियां और उसकी कार्यशैली ही जिम्मेदार नजर आती है। अन्यथा नहीं कि आज मानव अधिकारों के लिए जो भी आवाज बुलंद करेगा, वह राज्य की नजर में माओवादी ही कहलाएगा। ताजा गिरफ्तारी उसी की बानगी पेश करता है।kumar

कुमार नरेंद्र सिंह वरिष्‍ठ एवं देश के जानेमाने पत्रकार हैं। वह राष्‍ट्रीय सहाराहमार टीवीनई दुनिया समेत कई संस्‍थानों में वरिष्‍ठ पद पर काम कर चुके हैं। फिलहाल वह पाक्षिक पत्रिका लोक स्‍वामी के संपादक के तौर पर काम कर रहे हैं।