बाबा रामदेव पीएम मोदी को चुनौती पेश करने की तैयारी में हैं!

आलोक कुमार

: पुण्य प्रसून वाजपेयी का मास्टर स्ट्रोक : नई दिल्‍ली : पत्रकारिता का बंटाधार हो रहा है। यह कोई नई बात और न ही किसी से छिपी बात है। जो जहां है बस नौकरी किए जा रहा है। जो बाहर है वह एक अदद नौकरी के लिए किसी भी शर्त को मानने के लिए तैयार है। बस एक मौका दे दो प्लीज। बाजार ने हालत विकट कर दिया है। हालात ने हदें तय कर दी हैं। बस खांचे में फिट रहिए। बाहर निकले तो छपट दिए जाएंगे। खच्चाक।

अति उत्साही पुण्य प्रसून वाजपेयी फिर खेत हो गए। फिर साबित हो गया कि बाजार बड़ा है। संस्थानों को पत्रकारीय तेवर की कीमत नहीं चुकानी है। उनको व्यवसाय करना है। जो समझ ले वो सुरक्षित। जो न समझे, वह अनाड़ी है। मास्टर स्ट्रोक चलाने वाले प्रसून जी की नियति ही ऐसी है। उनके साथ ऐसा अक्सर होता है। आपबीती की बात करें, तो मास्ट्रक स्ट्रोक कार्यक्रम की बुनियाद ग्यारह साल पहले पड़ी थी।

पुण्य प्रसून वाजपेयी के नौ से दस बजे के शो का नामकरण बड़ी माथापच्ची के बाद मास्टर स्ट्रोक रखा गया था। वह सहारा टीवी में नव प्रयोग के दिन थे। सुनकर अचरज होगा कि सहारा में प्रसून जी का जज्बा बहाल किया गया था। उनकी बात इस कदर मानी गई कि सहारा शब्द को गुमकर चैनल का नाम “समय” रख दिया गया।

शिद्दत से नाजिम नकवी ने प्रसून जी के साथ मिलकर में नए ब्लू रंग का सेट तैयार करवाया था। हमारी जिम्मेदारी धारदार खबरों से मास्टर स्ट्रोक के रंगरोगन में मदद करने की थी। तब कोलकाता में बड़े व्यवसायी की बेटी प्रियंका तोड़ी के इश्क का मामला परवान चढ़ा था। आशिक रिजवानुल की साफगोई से हत्या कर दी गई। वामपंथी सरकार से व्यवसायी के गठजोड़ का खुलासा करने कोलकाता कूच कर गया।

काठमांडू जाकर किडनीकिंग डॉक्टर अमित को कैमरे पर उतार लाया। बस्तर जाकर सलवा जुडुम की ज्यादतियों को उजागर किया। पंजाब पहुंचकर ड्रग्स में बादल सरकार के कद्दावरों का खुलासा किया। खोजपरक रिपोर्ट के हवाले से मास्टर स्ट्रोक चमकाता रहा। प्रसून जी के तेवर गजब के थे। समय चैनल को ब्लैक आउट करने के बजाय सरकार के प्रवक्ता बार-बार कार्यक्म के दौरान आकर सफाई देते रहे।

सहारा जैसे संस्थान में रहकर उस स्तर की पत्रकारिता कर लेना अकल्पनीय था। याद है कि नोएडा दफ्तर के फ्लोर पर आकर खुद सुब्रत राय हाथ मिला गए। बधाई दे गए। सुमित राय के नैतिक बल का कमाल था। तब रेलमंत्री लालू यादव के इंटरव्यू के दौरान कुछ आफ रिकार्ड बातें कही गई। जिसे जोश से भरी टीम ने आन एअर कर दिया।

सहारा में हम सबके आने और बदलाव से असहज महसूस कर रही टीम ने इसे मुद्दा बना लिया। प्रसून जी से इस्तीफा मांग लिया गया। हम सब सिपाही की तरह उनके साथ निकलकर नोएडा के स्पाईस मॉल पहुंचे। नाजिम नकवी साथ सादा पेपर लाए थे। उसपर एन के सिंह, मैं, नाजिम नकवी, पंकज श्रीवास्तव और पीयूष पांडे बारी बारी से इस्तीफा लिख शहीद हो गए। इस्तीफा लिखने वालों में संजय बरागटा भी थे, लेकिन होशियार निकले। मैनेजमेंट के सामने जाकर पलट गए। उनकी नौकरी बच गई। हमसब सड़क पर आ गए। तब भी कोई बड़ा जुलूस प्रदर्शन नहीं निकला था। आज भी छिटपुट प्रतिक्रियाएं हैं।

इसबार पुण्य प्रसून से पहले मिलिंद खांडेकर के इस्तीफे की खबर आई। वह चौदह सालों से एबीपी न्यूज में थे। शाजी जमां के बाद मैनेजिंग एडिटर की कुर्सी थामी थी। उनके साथ काम कर चुके एक मित्र की राय में प्रसून और मिलिंद दो अलग तेवर के हैं। मिलिंद का रुख सरकार के प्रति नरम रहता है जबकि प्रसून हमेशा आन एयर सरकार के खिलाफ आग उगलना पसंद करते हैं।

ऐसे में दोनों के जाने में मेलमिलाप की बात समझ से परे है। छुट्टी पर अभिसार शर्मा को भी भेज दिया गया है। सच है कि टीवी के परदे पर प्रसून और अभिसार सरकार विरोधी रुख रखकर जितना जहर उगलते थे, उससे कई गुना ज्यादा तल्ख तेवर और कटाक्ष आनंद बाजार पत्रिका (एबीपी) समूह की ओर से प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक दे टेलीग्राफ का हुआ करता है। कोलकाता से प्रकाशित टेलीग्राफ दीदीमय रहता है।

ऐसे में प्रसून के साथ मिलिंद की नौकरी जाने का मतलब है, जो दिख रहा है वह है नहीं। सरकार बड़ी होती है, वह ऐसी ओछी हरकत नहीं कर सकती है। इससे पत्रकारिता का गलाघोंटने के भाव का पता लगता है। लोकतंत्र में इसका हर्जाना चुकाना पड़ता है। इतिहास है कि पत्रकारिता को दबाने वाली सरकारों को मुसीबत का सामना करना पड़ा है।

ऐसे में इसके पीछे बाजार का दांव ज्यादा नजर आता हैं। खोजी पत्रकारिता में मशगूल रहने वाले मित्र रजत अमरनाथ को इसमें बाबा रामदेव की साजिश की बू महसूस हो रही है। उनके विश्लेषण के मुताबिक बाबा बदला लेने में माहिर हैं। वह आजतक के थ्री डिग्री का हिसाब ले रहे हैं।

बाबा के बारे में एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट आई है कि वह खुद को अगले प्रधानमंत्री के तौर पर पेश करने की तैयारी में हैं। इसके लिए जरूरी है कि मौजूदा प्रधानमंत्री के बारे में गलत छवि प्रगाढ़ होती जाए। जनता को विकल्प की जरूरत महसूस होने लगे। बाबा के पास लक्ष्य साधने के काम आ सकने वाला धनबल पहले से ज्यादा मजबूत हुआ है। एबीपी पर मास्टर स्ट्रोक आन एयर होने के साथ ही पतांजलि के 40 करोड़ का विज्ञापन बंद था। अब संभव है कि विज्ञापन फिर शुरू हो जाए।

वरिष्‍ठ और देश के जाने माने पत्रकार आलोक कुमार के एफबी वाल से साभार. श्री कुमार आजतक, सहारा समय समेत कई अखबारों और चैनलों में काम कर चुके हैं.