….मैं कब का जा चुका हूं सदाएं मुझे न दो

राज बहादुर सिंह

: मेहदी हसन की पुण्य तिथि 13 जून पर विनम्र श्रद्धांजलि : किसी सुल्तान के यहां नहीं पैदा हुआ लेकिन वह बना शहंशाह। किसी की मेहरबानी से नहीं।अल्लाह के फजल और अपनी मेहनत से। घर गृहस्थी चलाने के लिए क्या क्या नहीं किया। साइकिल का मैकेनिक बना। फिर हुनर चमकाया और कार व ट्रैक्टर की बीमारी दूर करने का फन हासिल किया। इस बीच एक फनकार भी पलता रहा। और फिर जल्दी ही वह दिन भी आया जब दुनिया ने उस शख्स को शहंशाह का खिताब दिया।

शहंशाह गजलों का। और किसी शहंशाह के बारे में कुछ कहने की काबिलियत नाचीज की नहीं है फिर भी किन्हीं जजबात के तहत यह गुस्ताखी करने से खुद को रोक नहीं पा रहा हूं। आज छह साल हो गए मेहदी हसन साहब को इस फानी दुनिया से रुख्सत हुए लेकिन शहंशाह अपने पीछे इतना बड़ा और बेशकीमती खजाना छोड़ गया है कि कोई भी उस मे डूब जाए , खो जाए।

मैं कोई 15 साल का था। तब तक नाम कई गजल गायकों का सुना था लेकिन निकाह फ़िल्म में ली गयी हसरत मोहानी की गजल ‘चुपके चुपके रात दिन’ ही सही मायने में सुनी थी। अनूप जलोटा और पंकज उधास जैसे गायकों की भी कैसेट्स आने लगी थीं। इसी बीच मुझे एक कैसेट मेहदी हसन की मिली। बड़े चाव से लेकर आया घर और पैनासोनिक के टेप रिकॉर्डर पर सुना और बार बार सुना।

वह कैसेट मेहदी हसन के किसी लाइव कंसर्ट का था और उस में वह बीच मे ऑडियंस से गुफ्तगू भी करते जाते थे। उसमें कई मक़बूल गजलें थीं जिनमें ‘ रंजिश ही सही दिल ही ‘ भी शामिल थीँ। मेहदी हसन साहब ने अहमद फराज की इस ग़ज़ल के शेर गाए और फिर कहा कि दो और शेर हैं जिनके रदीफ़ और काफिया हूबहू हैं लेकिन यह फराज साहब के नहीं है।

मेहदी हसन साहब ने शायर का नाम तो नहीं बताया लेकिन इस नामालूम शायर के शेर भी गाए। किसी और मौके पर मेहदी हसन साहब की जबानी ही पता चला कि ये दोनों शेर तालिब बागपती साहब की गजल का हिस्सा थे। मुझे अब भी याद है दोनों शेर और आप की खिदमत में पेश करता हूं इन्हें-

माना कि मोहब्बत का छुपाना है मोहब्बत
चुपके से किसी रोज जताने के लिए आ।

जैसे तुझे आते हैं न आने के बहाने
ऐसे ही किसी रोज न जाने के लिए आ।

और फिर इस कैसेट ने बुनियाद रख दी गजल के प्रति मेरे आकर्षण और दिलचस्पी की। और इसी दौर में टीवी पर आया सीरियल मिर्ज़ा ग़ालिब और इसमें ग़ालिब के कलाम को जिस अंदाज में खासकर जगजीत सिंह ने गाया उसने गजल गायकी में एक नया बेमिसाल अध्याय जोड़ दिया और जगजीत सिंह बहुत बड़े गजल गायक बन गए। किसी से आगे नहीं तो किसी के पीछे उन्हें रखना भी नाइंसाफी होगी।

राजस्थान के झुंझनू जिले में पैदा हुए मेहदी हसन साहब की जिंदगी में फैसलाकुन मोड़ आया फैज अहमद फैज साहब की गजल- गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ बहार चले, चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले। इसके साथ ही हसन साहब का भी कारोबार चल निकला। उनकी चाहत में मुल्क की सरहद कभी दीवार नहीं बनी। दुखद रहा कि उनके आखिरी बीस साल बीमारी से जूझते गुजरे और 85 साल की उम्र में उन्होंने 2012 में आखिरी सांस ली। खुद हसन साहब की आवाज और अहमद फराज साहब के अल्फाज में उन्हें श्रद्धांजलि-

शोला था जल बुझा हूं हवाएं मुझे न दो
मैं कब का जा चुका हूं सदाएं मुझे न दो।

राज बहादुर सिंह उत्तर प्रदेश के जाने माने पत्रकार हैं. हिंदी-अंग्रेजी पर समान पकड़ रखते हैं. दैनिक जागरण समेत कई बड़े संस्थानों में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं. सियासत, फिल्म और खेल पर जबरदस्त पकड़ रखने वाले श्री सिंह फिलहाल पायनियर में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं. उनका लिखा फेसबुक से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.