वन विभाग का लूटतंत्र : सरकारी पैसा अधिकारियों और नेताओं की जेब में

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अनिल सिंह

: शिकायतों के बावजूद नहीं हो रही कार्रवाई : नीचे से लेकर ऊपर तक हो रहा भ्रष्‍टाचार : उत्‍तर प्रदेश बिहार सीमा पर बसे नौबतपुर-सैयदाराजा किसी दौर में सरकार के लिए सोने का अंडा देने वाली मुर्गी हुआ करती थी। यहां से सरकार को मोटा राजस्‍व मिलता था, लेकिन धीरे-धीरे भ्रष्‍टाचार का दीमक लगने के बाद सरकारी खाते में जाने वाले धन का बंदरबांट किया जाने लगा। यहां वसूली करके कई अधिकारी और नेता अरबपति हो गए। जीएसटी लागू होने के बाद वाणिज्‍य कर विभाग में तो खेल कम हुआ है, लेकिन वन विभाग एवं परिवहन विभाग की वसूली बदस्‍तूर जारी है। खासकर वन विभाग के अधिकारी सरकारी खजाने में जाने वाले धन से अपनी तिजोरियां भर रहे हैं।

वसूली का गंदा खेल  

चंदौली : सरकारी कर्मचारियों की नसों में बहती बेईमानी और नेताओं की रगो में बहता भ्रष्‍टाचार उत्‍तर प्रदेश में हालात बदलने देने को तैयार नहीं दिखता है। नीचे से लेकर ऊपर तक बैठे भ्रष्‍टाचारी अधिकारी सिस्‍टम को सुधारने की बजाय कमाने के नए-नए तरीके आजमाने में जुटे हुए हैं। इसका जीता जागता उदाहरण है यूपी-बिहार के बार्डर पर स्थित चंदौली जिला के सैयदराजा में स्थित वन विभाग का कार्यालय और चौकी। वन विभाग का क्षेत्राधिकारी कार्यालय अवैध वसूली का अड्डा बना हुआ है। वन उपज नहीं होने के बावजूद यहां जमकर सुविधा शुल्‍क की वसूली हो रही है, जिसका बड़ा हिस्‍सा नीचे से लेकर ऊपर तक बंटता है।

यह खेल लंबे समय से चला आ रहा है। इस खेल का खुलासा भी नहीं होता अगर वन विभाग के अधिकारी वसूली के नाम पर कागजात होने के बावजूद एक ट्रक चालक को कई दिनों तक बंदी बनाकर नहीं रखे होते। वन कार्यालय के बारे में अक्‍सर वसूली की शिकायतें ऊपर तक पहुंचायी जाती हैं, लेकिन नीचे से लेकर ऊपर तक पहुंचने वाला पैसा सबकी आंखें बंद रखता है।

दरअसल, मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ की कोशिशों से भ्रष्‍टाचारी थोड़े डरे तो जरूर हैं, लेकिन पिछली सरकारों में जमकर मलाई खाने की उनकी बुरी आदतें अब भी छूट नहीं रही हैं। इन लोगों को सत्‍ताधारी दल के साथ दूसरे दलों के नेताओं का भी संरक्षण मिला हुआ है। बिहार बार्डर पर स्थित यूपी के चंदौली जिले का नौबतपुर और सैयदराजा इलाका भ्रष्‍टाचार का बड़ा बदनाम अड्डा रहा है। बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी की सरकार में यहां वन विभाग के अलावा वाणिज्‍य कर और परिवहन विभाग के नाम पर भी जमकर खेल होता रहा है। अब भाजपा के कुछ नेता भी इसमें सक्रिय हैं।

ओवरलोड ट्रकों से वसूली और सुविधा शुल्‍क से कितना पैसा पैदा होता है इसका सबसे बड़ा उदाहरण बसपा-सपा सरकारों का चहेता एआरटीओ आरएस यादव रहा है, जिसने कुछ ही सालों में अरबों की सम्‍पत्ति खड़ा कर ली। खुद के साथ सपा-बसपा और भाजपा के भी कई नेताओं को अमीर बनने में मदद की। यदि योगी आदित्‍यनाथ की सरकार नहीं होती या फिर त्रिपुरारी पांडेय जैसा ईमानदार पुलिस क्षेत्राधिकारी नहीं होता तो शायद आरएस यादव जेल जाने की बजाय नोट बना रहा होता।

खैर, फिलहाल बात वन विभाग की। चंदौली में वन विभाग के अधिकारियों एवं कर्मचारियों के लूट और भ्रष्‍टाचार के चलते प्रदेश सरकार को प्रतिमाह लाखों रुपए के राजस्‍व का नुकसान उठाना पड़ रहा है। सरकारी धन के बंदरबांट के एवज में विभागीय कर्मियों एवं इनके दलालों की जेबें भर रही हैं। सैयदराजा के जमानिया मोड़ पर वन क्षेत्राधिकारी का रेंज कार्यालय है। यहां वन कार्यालय इसलिए स्‍थापित किया गया था कि वनोत्‍पाद को लेकर बिहार की तरफ से आने वाले या फिर बिहार जाने वाले वाहनों से ट्रांजिट शुल्‍क वसूलकर सरकारी राजस्‍व में वृद्धि की जा सके, लेकिन यह कार्यालय भ्रष्‍टाचार का अड्डा बन गया।

सरकार की वसूली कम खुद की जेबें ज्‍यादा भरी जाती है। कार्यालय पर आउट साइडर रखकर वसूली के काम को अंजाम दिया जाता है। हालात ऐसे हो गए हैं कि जिस ट्रक ने अवैध रकम नहीं दी, उसको अपने अधिकारों का दुरुपयोग करते हुए परेशान किया जाने लगा, लिहाजा ट्रक चालक किसी परेशानी से बचने के लिए वन क्षेत्राधिकारी कार्यालय पर सुविधा शुल्‍क चढ़ाकर ही आगे बढ़ते हैं। ऐसा नहीं करने वालों का हाल बुरा होता है।

दरअसल, यह मामला सामने आता भी नहीं अगर गोरखपुर नंबर के एक ट्रक को गलत तरीके से पकड़ा नहीं गया होता। झारखंड से बालू लादकर यूपी 53 ईटी 2333 नंबर की ट्रक रवन्‍ना एवं जीएसटी बिल लेकर गोरखपुर के लिए चली। रवना होने के चलते ट्रक चालक ने वन क्षेत्राधिकारी कार्यालय पर ट्रांजिट शुल्‍क जमा नहीं किया। ट्रक के सैयदराजा-जमानियां मार्ग पर आगे बढ़ी तो     वन क्षेत्राधिकारी  आरके दीक्षित के आदेश पर वन दरोगा राजेश तिवारी व मनीष राय ने इस ट्रक का पीछाकर पकड़ लिया।

वन विभाग की कहानी के अनुसार यह ट्रक बिना ट्रांजिट शुल्‍क जमा किए भागी जा रही थी, जिसे लोकमनपुर गांव के पास से पकड़कर सीज कर दिया गया। सीज करने के बाद इस गाड़ी को रामनगर रेंज कार्यालय भेज दिया गया। ट्रक चालक के पास बिहार या झारखंड का कोई परमिट नहीं था, जिसकी वजह से ट्रक को सीज कर चालक को निजी मुचलके पर छोड़ दिया गया। वन कर्मियों के अनुसार गाड़ी को जब लोकमनपुर के पास से पकड़ा गया तो अंबेडकर निवासी ट्रक ड्राइवर बेचू ने बताया कि हमारे मैनेजर ने कहा था कि बिना ट्रांजिट शुल्क दिए गाड़ी ले जाना।

खैर, इस कहानी का दूसरा पहलू यह है कि चालक को वसूली के लिए अवैध तरीके से तीन दिनों तक चौकी पर बैठाए रखा गया। ट्रक चालक बेचू ने बताया कि उससे सारे कागजात मांगने के बाद चौकी पर लाया गया। उसे 16 सितंबर को पकड़ा गया और लगातार तीन दिन तक चौकी पर बैठाए रखा गया। खाने और दैनिक क्रिया के अलावा उसे ना तो सोने दिया गया और ना ही नहाने दिया गया।

इधर, ट्रक मालिक गोरखपुर निवासी नौशाद ने बताया कि ट्रक चालक झारखंड से गोरखपुर तक का खनन विभाग द्वारा जारी रवना व जीएसटी बिल लेकर चला था इसके बावजूद ट्रक को वन विभाग द्वारा पकड़ लिया गया। वह भी तब जबकि सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2017 में आदेश दिया है कि अगर बालू वन क्षेत्र के बाहर से लादकर आता है तो वन विभाग को ट्रांजिट शुल्‍क वसूलने का अधिकार नहीं है। इसके बावजूद वन विभाग सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना करते हुए जबरिया ट्रांजिट शुल्‍क और वसूली करता है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार बालू वन उपज नहीं है। ऐसे में बालू पर कोई ट्रांजिट़ शुल्क नहीं लगना चाहिए। बावजूद इसके नौबतपुर में बालू की गाड़ियों से 2000 से लगायत 3000 तक ट्रांजिट शुल्‍क लिया जाता है। इसके अलावा बिहार-झारखंड से कोयला लादकर आने वाली गाडि़यों से भी वसूली होती है। ट्रांजिट शुल्‍क के अलावा प्रत्‍येक गाड़ी से पांच सौ रुपए तक अतिरिक्‍त वसूले जाते हैं।

सितंबर 2017 में सुप्रीम कोर्ट का आदेश आने के बाद तत्कालीन डीएफओ गोपाल ओझा और वन क्षेत्राधिकारी नरेन्द्र कुमार राय ने ट्रांजिट शुल्क की वसूली बंद कर दी थी, लेकिन आउटसाइडरों के जरिए ऊपरी वसूली लगातार जारी थी। छह महीने तक वसूली बंद रहने के बाद जब पुराने डीएफओ और रेंजर का तबादला हो गया और नए लोगों को जिम्‍मेदारी मिली से ट्रांजिट वसूली का काम फिर से शुरू कर दिया गया।

एक अनुमान के अनुसार नौबतपुर चेकपोस्‍ट से प्रतिदिन बालू, कोयला एवं अन्‍य सामानों के साथ प्रतिदिन चार से पांच हजार गाडियां गुज‍रती हैं। इनमें से 400 से 500 तक बालू लदे वाहन होते हैं। वन विभाग इन वाहनों से ट्रांजिट शुल्क के अलावा लगभग डेढ से दो लाख रुपए की प्रतिदिन अतिरिक्‍त वसूली करता है। जमानिया मोड़ स्थित वन क्षेत्राधिकारी का रेंज कार्यालय का दबदबा इतना है कि बिना चढ़ावा चढ़ाए पार हो पाना मुश्किल है।

ट्रक चालकों का आरोप है कि वन विभाग को सुविधा शुल्क विभाग नहीं देने पर यहां रखे गए आउट साइडरों के जरिए उन्‍हें परेशान कराया जाता है। आरोप है कि यहां कार्यरत वन कर्मियों पर स्‍थानीय भाजपा नेताओं का भी हाथ है, जिन्‍हें संरक्षण देने के बदले प्रसाद मिलता है।

बड़ा सवाल यह है कि मुख्यालय से मात्र नौ किलोमीटर की दूरी पर स्थित वन क्षेत्राधिकारी कार्यालय की शिकायतें मिलने के बाद भी जिले के जिम्‍मेदार अधिकारी पहुंचकर जांच या औचक निरीक्षण नहीं करते हैं। वन विभाग की इसी वसूली के चलते प्रदेश के कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही भी दो चार हो चुके हैं। उनके निर्देश पर तत्‍काल से कुछ कार्रवाई की गई, लेकिन मामला ठंडा होते ही वसूली फिर से चालू हो गई।

कई ट्रक चालकों ने बताया कि खनन विभाग द्वारा जारी रवना (रसीद) दिखाने पर भी वन विभाग ट्रांजिट शुल्क 38 रुपये प्रति घनमीटर की दर से वसूली करता है। साथ ही सुविधा शुल्क के नाम पर प्रति गाड़ी500 पांच सौ रुपये भी लेता है। सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि अगर बालू वन क्षेत्र के बाहर से खनन होता है तो वन विभाग उस पर ट्रांजिट शुल्क नहीं लेगा, लेकिन सैयदराजा स्थित वन विभाग कार्यालय इस आदेश की ही अवहेलना करता है।

इन आरोपों के संदर्भ में जब प्रभागीय वनाधिकारी मनोज कुमार खरे से सवाल किया गया तो उन्‍होंने कहा कि ट्रांजिट शुल्‍क उन्‍हीं वाहनों से लिया जाता है, जिन पर वन उत्‍पाद होता है। साथ ही खनन का रवना ना दिखाने वालों से भी ट्रांजिट शुल्‍क लिया जाता है। इसके अलावा कोई वसूली नहीं होती।

दरअसल, यूपी-बिहार का यह बार्डर वन विभाग, वाणिज्‍य कर, परिवहन विभाग, पुलिस विभाग आदि के लिए कुबेर का खजाना माना जाता है। यहां पर ट्रांसफर-पोस्टिंग के लिए लाखों रुपए खर्च किए जाते हैं। यहां का थाना लाखों रुपए महीने में बिकता है। जाहिर है, जब कोई भी सरकारी कर्मचारी पैसे देकर यहां पर पोस्टिंग पाएगा तो वसूली ही करेगा, भजन नहीं गाएगा। ऐसा ही यहां नियुक्‍त होने वाले ज्‍यादातर विभागों के सरकारी कर्मचारी करते हैं।

पूर्व चेयरमैन अरविंद कुमार

 

सैयदराजा के पूर्व चेयरमैन अरविंद कुमार कहते हैं, ”वन विभाग के कर्मचारी और अधिकारी लंबे समय से अवैध वसूली में लिप्‍त है। अवैध वसूली की तमाम शिकायतें ऊपर से लेकर नीचे तक लोग करते रहते हैं, खबरें छपती हैं, लेकिन कहीं कोई कार्रवाई नहीं होती है। पिछली सरकारों में कोई सुनने वाला नहीं था। भाजपा सरकार में कभी ज्‍यादा दबाव पड़ने पर कार्रवाई होती भी है तो कुछ दिन रुके रहने के बाद फिर से पुराने ढर्रे पर वसूली शुरू हो जाती है। वन विभाग के अधिकारियों के लिए तो सुप्रीम कोर्ट का आदेश भी मायने नहीं रखता। वन क्षेत्र से बाहर से आने वाले खनिजों पर भी ट्रांजिट शुल्‍क के साथ अवैध वसूली की जाती है।”

दरअसल अरविंद कुमार लंबे समय से नौबतपुर चेकपोस्‍ट पर होने वाली गड़बडि़यों को नजदीक से देखते आ रहे हैं इसलिए इस खेल की पूरी जानकारी उनके पास है। चंदौली निवासी राजेश कुमार सिंह कहते हैं, ”यह धंधा इसलिए चलता है कि इसमें सपा, बसपा और भाजपा के स्‍थानीय नेताओं का भी संरक्षण रहता है। बदले में उनके नाम पर भी वसूली करके उन्‍हें महीना दिया जाता है।” यह आरोप पहले भी लगता रहा है कि उत्‍तर प्रदेश में प्रभावी राजनीतिक दलों के नेताओं और उनके चेले-चपाटी भी यहां से मोटी वसूली करते हैं।

वसूली में नेताओं का भी हिस्‍सा

नौबतपुर चेकपोस्‍ट पर नेताओं के नाम से भी वसूली होती है। जिले के कई बड़े नेताओं के नाम वसूली को लेकर चर्चा में रहते हैं। बताया जाता है कि वन विभाग के अलावा परिवहन विभाग से भी नेताओं की वसूली होती है। नेताओं का संरक्षण होने से अधिकारी भी बेखौफ वसूली के कामों को अंजाम देते हैं। उदाहरण के लिए अगर नौबतपुर चेकपोस्‍ट से होकर बालू की पांच सौ ट्रक गुजरते हैं तो केवल सौ या दो सौ ट्रकों से ही ट्रांजिट शुल्‍क लिया जाता है। शेष तीन सौ ट्रकों से होने वाली आय अधिकारियों और नेताओं के जेब में जाती है।

इन तीन सौ ट्रकों से ट्रांजिट शुल्‍क के बदले वसूली की जाती है। जैसे किसी ट्रक का ट्राजिट शुल्‍क तीन हजार रुपए हुए तो इससे ढाई हजार लेकर पास करा दिया जाता है। यह पैसा किसी अधिकारी, नेता के जेब में जाती है। इसके अलावा इस सभी ट्रकों से पांच सौ रुपए का सुविधा शुल्‍क अलग लिया जाता है।

ऐसे होती है वसूली

नौबतपुर की तरफ से आने वाले ट्रकों को एक अनुमान के हिसाब से आवंटित कर दिया जाता है। जैसे किसी नेता या अधिकारी के नाम से प्रतिदिन दस ट्रक आवंटित हो गए तो इन दस ट्रकों से होने वाली वसूली उस नेता या अधिकारी के खाते में जाता है। वसूली का काम आउटसाइडर करते हैं। यहां इसके लिए पूरा सिंडिकेट बना हुआ है। इनके द्वारा खास तरह का एक कूपन चालक को पकड़ा दिया जाता है।

चेकिंग के समय इस कूपन को दिखाने के बाद किसी भी प्रकार की रोक-टोक नहीं होती है। कूपन देखने के बाद चालक को हरी झंडी दे दी जाती है। इस खेल के चलते उत्‍तर प्रदेश सरकार को रोजाना लाखों रुपए का नुकसान होता है। इस पैसे से नेता और अधिकारियों की जेबें भरती हैं।

अनिल सिंह की रिपोर्ट.