जीवन के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचे लालजी टंडन

राज बहादुर सिंह

: बेदाग जीवन, सादगी और शुचिता से लबरेज सियासी सफर : सज्जनता, शालीनता, राजनीतिक गरिमा के प्रति सदैव सचेत रहना और दामन को पाक साफ रखना बावजूद बरसों तक सत्ता प्रतिष्ठान के लाभ के पदों पर आसीन रहने के। विचारधारा के प्रति निष्ठा और पार्टी के प्रति समर्पण का पारितोषक है लालजी टंडन को बिहार का राज्यपाल बनाया जाना।

मैं मानता हूं और मुझे जानकारी भी है जो आज हुआ उसे कोई तीन साल पहले हो जाना चाहिए था लेकिन तब शायद वही कहावत चरितार्थ हुई-कुछ गुड़ ढीला, कुछ बनिया। राज्य सभा जाने की इच्छा थी और लगभग तय भी था लेकिन राजनीति की साइकिल कई बार अनपेक्षित मोड़ भी लेती है और तब यही हुआ और वजह बने एक मुख्यमंत्री जिन्हें देश का रक्षा मंत्री बनाया गया था।

खैर लालजी टंडन के जीवन में राज्यपाल का पद प्रोटोकॉल के लिहाज से सबसे बड़ा पद है। इसके पहले वह लगभग आठ साल प्रदेश सरकार में अधिकार प्राप्त महत्वपूर्ण विभागों के कैबिनेट मंत्री रहे और बसपा के साथ 2002 की सरकार में वह अघोषित डिप्टी सीएम थे। कई विभागों के चार्ज के साथ। नजरिया सदैव विकास पर केंद्रित रहा।

लालजी टंडन के जीवन से जो बात सीखने और प्रेरणा लेने की है वह है विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य का दामन न छोड़ने का। याद कीजिए 1977 को जब जनता पार्टी का गठबंधन तोड़ने की धमकी देकर स्वर्गीय हेमवती नंदन बहुगुणा ने लखनऊ वेस्ट सीट पर टंडन जी का टिकट कटवाकर अपने करीबी स्वर्गीय डीपी बोरा को टिकट दिलवा दिया था।

टंडन पर दबाव था उनके समर्थकों का निर्दलीय चुनाव लड़ने का लेकिन भरे मन और रुंधे गले से नानाजी देशमुख की बात मानकर उन्होंने पर्चा वापस ले लिया। बोरा विधायक बन गए और टंडन विधान परिषद पहुंचे। बोरा उसके बाद कभी कोई चुनाव नहीं जीते और टंडन राज्य सभा छोड़कर हर सदन के सदस्य रह लिए और मंत्री भी।

ऐसा ही वाकया तब का भी है जब वह 1990 में डॉ दाऊजी गुप्ता से इनडाइरेक्ट होने वाला मेयर का चुनाव हार गए। बमुश्किल एक साल ही बीता कि लालजी टंडन नगर विकास मंत्री के तौर पर प्रदेश भर के महापौरों की बैठक को चेयर कर रहे थे। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 की घनघोर सहानुभूति लहर में पार्टी ने उन्हें लोकसभा चुनाव लड़ने को कहा तो परिणाम को जानते हुए भी सहर्ष उनका तैयार हो जाना पार्टी के प्रति समर्पण का परिचायक था।

मेरी मान्यता है कि लालजी टंडन के राजनीतिक जीवन का सबसे उच्च पद विधान सभा में नेता प्रतिपक्ष का पद था। वह लगभग चार साल तत्कालीन सीएम मुलायम सिंहः यादव के अपोजिट विधान सभा में LOP रहे। और अब उस पायदान से ऊपर उठकर बिहार के संवैधानिक मुखिया का दायित्व निभाएंगे। आशा और शुभकामनाएं देते हुए पूर्ण विश्वास है कि वह इस असाइनमेंट में भी हमेशा की तरह खरे उतरेंगे।

rbsराज बहादुर सिंह उत्तर प्रदेश के जाने माने पत्रकार हैं. हिंदी-अंग्रेजी पर समान पकड़ रखते हैं. दैनिक जागरण समेत कई बड़े संस्थानों में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं. सियासतफिल्म और खेल पर जबरदस्त पकड़ रखने वाले श्री सिंह फिलहाल पायनियर में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं. उनका लिखा फेसबुक से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.