सारी समस्‍या दिल्‍ली में है

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अनिल सिंह

जब उन्‍होंने कहा था कि पूरी समस्‍या दिल्‍ली में बैठी सरकार में है, तब हम भी मान गये थे कि पूरी समस्‍या ससुरी दिल्‍ली में ही है. हमने दिल्‍ली की समस्‍या सुलझाने को सरकार की समस्‍या हल कर दी. सरकार की समस्‍या हल होने के बाद वो लोकतंत्र की चौखट पर जब लेट गये, तब लगा कि ये उतने गिरे हुए भी नहीं हैं. फिर वो सौ स्‍मार्ट सिटी देकर गांव गोद ले लिये, लगा सब कुछ बदल जायेगा. अब हम यूरोप को पीछे छोड़कर अटलांटा की तरफ बढ़ जायेंगे. सही में, सारी समस्‍या अब तक दिल्‍ली में ही थी.

फिर जब उन्‍होंने काला धन सफेद करने वाला मास्‍टर स्‍ट्रोक चलते हुए कहा कि पचास दिन दीजिये आपको एक नया भारत दूंगा, तब तो पक्‍का यकीन हो गया कि समस्‍या तो साली दिल्‍ली में ही थी. अब हर गरीब अमीर हो जायेगा, ईमानदारी सड़कों पर बहेगी. सरकारी कर्मचारी बेईमानी छोड़ देंगे. आईएएस-पीसीएस कमीशन लेना छोड़ देंगे. युवाओं को रोजगार मिल जायेगा. किसान ऑनलाइन ही फसल बोकर काट लेगा. माल्‍या, मोदी, चोकसी जबरदस्‍ती बैंकों को कर्जा लौटा देंगे. पुलिस वाले घूस मांगना और फर्जी केस करना छोड़ देंगे.

मुझे लग गया कि क्‍या बात है, जो सत्‍तर सालों में नहीं हो पाया वो अब पचास दिनों में हो जाने वाला है, तभी मैं समझ गया कि नोटबंदी के बाद देश में सब कुछ सुधर जायेगा, सरकारी स्‍कूल प्राइवेट लुटेरों को मात दे देंगे. रमेशवा, कलुआ, हनीफवा, पीटरवा, बलवंतवा खटाखट अंग्रेजी में बोकरादी करेंगे. ये सब बड़ा बड़ा रिसर्च करके हमेशा हमारे कुंडली में अपना घर छोड़कर शनिचर-बुध के घर में बैठने वाले मंगल, बेफे और शुकर को उनके घर में बैठायेंगे तथा वहां पर अमेरिका-फ्रांस-चीन से पहले पानी-सानी ढूंढ निकालेंगे.

भिखारी सड़कों पर भीख मांगना छोड़कर कार-बाइक से ऑनलाइन या पेटीएम, एटीएम से पैसा प्राप्‍त करेगा. अस्‍पताल और डाकटर हर हजार-दो हजार लोगों पर उपलब्‍ध होंगे. गरीब फुटपाथ पर नहीं सोयेगा. नक्‍सलियों और आतंकवादियों की कमर टूट जायेंगी. हमारे सैनिक शहीद होने से बच जायेंगे. विश्‍वविद्यालयों में शानदार रिसर्च होने लगेंगे. वो पचास दिन है और आज का दिन है कि हम चौराहे पर ही बैठकर उनका इंतजार कर रहे हैं, और वो टीवी छोड़कर केवल विदेश गये या फिर ट्विटर पर.

अब जब सारे देश करोना से लड़ने में परेशान हैं तब भी महामानव ने मास्‍टर स्‍ट्रोक चल दिया है. आज देश कोरोना से जीत गया है. पहले घंटी बजाकर कोरोना को बहरा कराया गया, फिर दीया-बाती करवाकर उसे अंधा किया गया, और मौका हाथ लगते ही हथौड़ी से कोरोना को कूंच दिया. कुछ आंहर-बहिर कोरोना राह भटककर चीन-पाकिस्‍तान पहुंच गये. कुछ को मुंहजुबानी ही मार गिराये. कुछ को भाषण समय वाली ताली पीटकर किनारे लगा दिये. फिर भी कुछ लोगों को लगता है कि कोरोना से लड़ाई केवल अस्‍पताल, डाक्‍टर, पीपीई किट और जांच से ही हो सकती है.

मुझे तो कभी कभी विरोधी दलों की सोच पर शर्म आती है. एक व्‍यक्ति, जो अकेले इस देश के लिये लड़ रहा है और विरोधी उसके प्रयास को असफल करने के लिये कोरोना से हाथ मिलाने से परहेज नहीं कर रहे हैं. भारतीयों के हजारों साल की तपस्‍या का फल है कि देश को आगे ले जाने के लिये एक ऐसा व्‍यक्ति मिला है, जो अर्थशास्‍त्री है, वैज्ञानिक है, तांत्रिक है, इंजीनियर है, स्‍पेस साइंटिस्‍ट है, मौसम विज्ञानी है, रडार ज्ञाता है, डाक्‍टर है, मास्‍टर है, एक्‍टर है, दुकानदार है, खेलाड़ी है, संगीतकार है, डिग्रीधारक है और फॉरेन रिटर्न है. यह सौभाग्‍य किसी देश की किस्‍मत में हजारों साल बाद आता है.

भारत देश सौभाग्‍यशाली है और ऐसे महामानव के देश में कोरोना क्‍या बिगाड़ लेगा किसी का? फिर भी वो महामानव अकेले कोरोना से मुकाबला कर रहा है, वह भी निहत्‍था! बिना किसी औजार और हथियार के कोरोना से दो दो हाथ कर रहा है! यह देश बिना अस्‍पताल, बिना जांच, बिना वेंटिलेटर, बिना पीपीई के भी जीत जायेगा, क्‍योंकि उसे कन्‍फ्यूज करके मारने बनाई गई रणनीति सफल हो गई है. ये कोरोना का किस्‍मत है कि वह कामचोर, कमजर्फ सुबह टहलने नहीं निकलता है, अन्‍यथा ये देश तो कब का जीत चुका होता.

कोरोना को इसीलिये कनफ्यूज करके मारने की रणनीति के तहत जांच कम कराया जा रहा है. खराब जांच किट मंगवा जा रहा है. चीजें महंगी खरीदी जा रही हैं ताकि उसे लगे कि वह भारत में आकर फेल हो गया है, और इस टेंशन में खुद ही सुसाइड कर ले. लॉकडाउन भी ऐसा ही मास्‍टर स्‍ट्रोक है, जो पचास-साठ दिन में नया भारत दे देगा. पिछले पचास दिन वाले नये भारत के बाद भी हम चौराहे पर इंतजार कर रहे थे और इस लॉकडाउन के पचास-साठ दिन बाद सड़क पर होंगे, लेकिन खाली पेट और हाथ. समस्‍या साली अब भी दिल्‍ली में ही है.