बीएचयू की अराजकता का ठीकरा एक बार फिर छात्रों के सिर पर

हरेंद्र शुक्‍ला

: नैतिक धर्म भूले रेजिडेंट, उच्चपदस्थ अधिकारी क्यों जबाबदेही से बरी :  वाराणसी। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय अगले तीन दिनों तक के लिए बंद कर दिया गया। छात्रावास खाली करा दिये गये  और फिर एक बार अराजकता की ठीकरा छात्रों के सिर फोड़ दिया गया। कोई यह बताने वाला नहीं कि जहां से बवाल की तोहमत है, उन रेजिडेंट डाक्टरों के खिलाफ क्या काररवाई की गई?

कोई यह तय करने वाला नहीं है कि इस पूरे प्रकरण में तत्कालीन कुलपति प्रो. जीसी त्रिपाठी के कार्यकाल में 75 हजार रुपये प्रतिमाह मानदेय पर रखे गये बिहार कैडर के सेवानिवृत्त सुरक्षा सलाहकार, छात्र अधिष्ठाता, चीफ प्राक्टर सहित अन्य उच्चपदस्थ अधिकारियों की भी कोई जिम्मेदारी बनती है या नहीं?

उम्मीद की जा रही थी कि विश्वविद्यालय प्रशासन इस गंभीर घटना के बाद  कम से कम नीर-क्षीर विवेक के साथ कुछ ठोस निर्णय लेगा। अराजकता के बुनियादी कारणों और अराजक तत्वों की पहचान कर उनके साथ सख्ती बरतेगा किन्तु हर बार की तरह इस बार भी निराशा ही हाथ लगी। छात्रावास भांय-भांय कर रहे हैं। छात्र जा चुके हैं, परिसर छावनी बना हुआ है।

सबसे त्रासद यह कि जिन्होंने बवाल कि शुरुआत की वे अपना नैतिक धर्म भुलकर अब भी हड़ताल ठाने हुये हैं। दूर-दराज से आये मरीजों की फजीहत हो रही है उनकी बला से। दो चार दिनों के लिए विश्वविद्यालय के बंद होने से कक्षाएं भले ही बंद हो गई हों, लेकिन इस बंदी से विचारों का प्रवाह और चर्चाओं का दौर नहीं थमता। और दुर्भाग्य कि परिसर से लेकर शहर तक की चर्चाओं का सार यही है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने न्याय नहीं किया?