…और बाबा के दरबार में ऐसा हुआ तो टूट कर बिखर गए तिवारीजी, देखें वीडियो

हरेन्द्र शुक्ला 

: 24 सालों से बाबा विश्वनाथ को भजन सुना रहे राधिका रंजन को एक अदद उद्धव की तलाश :  पीएम से लगाई गुहार बाबा दरबार में बहती रहे भजनो की रसधार : वाराणसी।  किसी आत्मीय से बिछड़ने की विरह कैसी होती है इसका अंदाजा पोथियों पर पोथियां भर देने वाले कवियों की कविताओं से अनुभव किया जा सकता है। लेकिन उस पीर की अभिव्यक्ति भला कैसे हो जो किसी भक्त को उसके भगवान से विलग कर देने से होता है।

ऐसी व्यथा का अनुभव किया वयोवृद्ध गायक राधिका रंजन तिवारी ने, जब बाबा श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर प्रशासन के कारिंदों ने 24 सालों से बाबा को भजन सुना रहे इस गायनाचार्य का हाथ पकड़कर उसकी गद्दी से उठा दिया। मंदिर प्रशासन की इस कृत्‍य से पं. राधिका रंजन तिवारी लगभग टूट से गए हैं। दुखी मन से घंटों घाटों की सीढि़यों पर बैठे गंगा की लहरों को निहारते रहते हैं। ऐसा लगता है जैसे किसी फरिश्‍ता को तलाश रहे हैं, जो उनका यह दर्द कम कर सके।

इस घटना से बेतरह उद्वेलित तिवारी जी से भेंट होती है, अर्ध विक्षिप्त अवस्था में भटकते हुए तुलसीघाट पर। गायनाचार्य पं राधिका रंजन तिवारी बताते हैं कि दुनिया का कोई भी मरहम उनके इस जख्म को नहीं भर सकता। उन्होंने इस व्यथा से प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित वाराणसी जिला प्रशासन को खत के माध्यम से अवगत करा दिया है और अपेक्षा की है कि एक भावुक कलाकार के साथ न्याय हो सकेगा।

तिवारी जी का कहना है कि ब्रज की गोपियों की पीड़ा सुनने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने उद्धव को गोकुल भेजा था। लेकिन तिवारी जी को तलाश है एक समर्थ उद्धव की, जो उनकी पीड़ा बंटा सके और उन्हें न्याय दिला सके। बताते चलें कि श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर के गायनाचार्य पं राधिका रंजन तिवारी वर्ष 1995  से मंगला आरती के दौरान मंदिर परिसर में एक किनारे बैठकर बाबा को भजन सुनाते आ रहे हैं।

इस बाबत पं राधिका ने फफकते हुये बताया कि गत 30 जुलाई को सावन के प्रथम सोमवार को मैं जब अपने निर्धारित समय पर मंदिर गया और नियत स्थान पर बैठकर भजन की प्रस्तुति की तैयारी ही कर रहा था कि एक सुरक्षाकर्मी के साथ मंदिर प्रशासन के तीन लोग आये और बांह पकडकर हमें यह कहते हुये उठा दिये कि मंगला आरती की रसीद लिये बिना आप यहां भजन नहीं सुना सकते।

उन्‍होंने बताया कि यह देख मैं सकते में आ गया और मन मसोसकर मैंने 12 सौ रुपये की रसीद लिया तब जाकर मैं बाबा को भजन से अराधना कर सका। जबकि मेरे पास वर्ष 1995 में तत्कालीन मुख्य कार्यपालक अधिकारी का वैध आदेश पत्र, परिचय पत्र, एसपी सुरक्षा की ओर से जारी प्रवेश पत्र भी है। यहां तक कि मुझे मंदिर प्रशासन की ओर से प्रतिमाह गत 11 सालों से 6880 रुपये का मानदेय भी सीधे मेरे खाते में आता है।

श्री तिवारी कहते हैं कि इन सब के बावजूद सारी हकीकत बताने पर भी लोग नहीं माने और कहा कि मुख्य कार्यपालक अधिकारी का यह आदेश है कि आप यहां भजन नहीं गायेंगे। उस दिन से मैं मंदिर नहीं जा पा रहा हूं। बाबा को 24 सालो से लगातार भजन सुनाते आ रहा हूं। ऐसे में मुझे मेरे बाबा और आराधना के अधिकार से वंचित किया जा रहा है, इससे मैं बहुत व्यथित हूं। उन्होंने यह भी बताया कि सारे साक्ष्यों के साथ मैंने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और वाराणसी के मण्डलायुक्त को अपनी पीड़ा से अवगत कराते हुये आराधना के अधिकार के तहत परंपरागत तरीके से बाबा को भजन सुनाने की मांग की है।

संविधान नागरिकों को दे रखा है अराधना का अधिकार : ज्योति मिश्र 

गायनाचार्य पं राधिका रंजन तिवारी की व्यथा से व्यथित सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता ज्योति मिश्र ‘राका’ का इस मामले में कहना है कि यहां सिर्फ तिवारी जी का दिल नहीं तोडा गया है बल्कि भारतीय संविधान के नियमों को तोड़ने की हिमाकत की गई है। संविधान देश के हर नागरिक को उसकी आराधना का अधिकार देता है। यदि यह मामला न्यायालय में गया तो प्रशासन और मंदिर प्रबंधन को जबाब देते नहीं बनेगा।

बनारस से वरिष्‍ठ पत्रकार हरेंद्र शुक्‍ला की रिपोर्ट. श्री शुक्‍ला अमर उजाला, दैनिक जागरण, आज समेत कई अखबारों में कार्यरत रहे हैं.