मुजफ्फरपुर अंडरवर्ल्ड की इनसाइड स्टोरी-2 : गब्बर की हत्या से शुरू हुआ कैंपस में लाश गिरने का सिलसिला

कुणाल वर्मा 

: भूमिहार वर्सेज भूमिहार की जंग शुरू हो गई थी : 90 के दशक में मिनी नरेश और चंदेश्वर सिंह की हत्या ने मुजफ्फरपुर में एक अलग तरह का माहौल पैदा कर दिया था। लोग हमेशा सशंकित रहते थे कि कब किसकी लाश गिर जाए। सबसे ज्यादा दहशत का माहौल लंगट सिंह कॉलेज और बिहार यूनिवर्सिटी कैंपस में रहता था। किसी के साथ हाथापाई की मामूली खबर उड़ते ही धड़ाधड़ क्लासरूम में बंद हो जाते थे। कक्षाएं स्वत: स्थगित हो जाती थी। वर्चस्व की जंग अब जाति से ऊपर उठकर पूरी तरह क्षेत्रवाद की जद में आ चुकी थी। भूमिहार वर्सेज भूमिहार की जंग शुरू हो गई थी।

एक तरफ मुंगेर अंचल से आए भूमिहारों का ग्रुप था, जिसमें बेगुसराय के भूमिहार सबसे अधिक दबंग थे। वीरेंद्र सिंह, अशोक सम्राट से लेकर मिनी नरेश तक सभी इसी अंचल से आए दबंग थे। दूसरी तरफ तिरहूत अंचल के भूमिहार थे, जिसका प्रतिनिधित्व रघुनाथ पांडे, छोटल शुक्ला, भुटकुन शुक्ला जैसे दबंग कर रहे थे। भूमिहारों की इस आपसी लड़ाई का सबसे बड़ा फायदा उठाया बृजबिहारी प्रसाद ने। बृजबिहारी भी कैंपस की ही पैदाइश थे, लेकिन यह कैंपस लंगट सिंह कॉलज और बिहार यूनिवर्सिटी का कैंपस नहीं था। वह कैंपस था मुजफ्फरपुर इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी यानि एमआईटी का। दोनों कैंपस शहर के दो छोर पर था।

इसे भी पढ़ें : मुजफ्फरपुर में अंडरवर्ल्ड की इनसाइड स्टोरी : 1990 में अशोक सम्राट ने दिखाई थी एके 47 की हनक

बिहार यूनिवर्सिटी कैंपस में बर्चस्व की जंग में भूमिहार आपस में लड़ रहे थे, वहीं शहर के दूसरी छोर पर बसे एमआईटी कैंपस से निकलकर बृजबिहारी ने पूरे बैरिया क्षेत्र में बेहद कम समय में अपनी दबंगई कायम कर ली थी। भूमिहारों की आपसी लड़ाई का सबसे अधिक फायदा बृज बिहारी प्रसाद ने ही उठाया। वह दलितों, पिछड़ों और बनियों का सबसे बड़ा मसीहा बन कर उभरा। तमाम पिछड़ी जातियों को उसने संगठित कर अपना साम्राज्य खड़ा कर लिया। बता दूं कि यही वो समय था जब बिहार की राजनीति में लालू यादव भी अपनी चरम पर थे।

1991 – गब्बर सिंह की हत्या : उधर, इस बीच यूनिवर्सिटी कैंपस में लाशों का गिरना जारी रहा। मिनी नरेश की हत्या के बाद यूनिवर्सिटी और लंगट सिंह कॉलेज कैंपस में नया नाम उभरा गब्बर सिंह का। 1991 में हिन्दी फिल्म आई थी 100 डेज। इसी फिल्म का एक गाना था..गब्बर सिंह यह कहकर गया जो डर गया वो मर गया। कैंपस में इस गाने ने गब्बर सिंह को चमकाने में और मदद की। मैं उस वक्त बिहार यूनिवर्सिटी कैंपस में संचालित बिहार यूनिवर्सिटी कैंपस स्कूल का छात्र था। यह स्कूल बिहार यूनिवर्सिटी के ही रिटायर्ड शिक्षकों द्वारा संचालित किया गया था। मेरे पिताजी जी भी प्रोफेसर थे, इसलिए इसी स्कूल में पढ़ाई चल रही थी।

इस स्कूल में ज्यादातर शिक्षकों के ही बच्चे पढ़ते थे। लंगट सिंह कॉलेज के आर्ट्स ब्लॉक के ठीक बगल में यह स्कूल था। इसलिए कैंपस में होती गतिविधियों के हम गाहे बगाहे साक्षी बनते थे। गब्बर सिंह का नाम पहली बार वहीं सुना था। उसे कभी देखा नहीं था। पर उसके नाम की दहशत पूरे कैंपस में थी। शयद वह फरवरी या मार्च के महीने की बात थी। लंगट सिंह कॉलेज का कैंपस बम के धमाकों से गूंज उठा। ताबड़-तोड़ बम मारे जा रहे थे। स्कूल बिल्डिंग से बाहर गुनगुनी धूप में हमारी कक्षाएं लगी हुई थी। चारों तरफ अफरातफरी मच गई। तत्काल स्कूल की छुट्टी कर दी गई।

इसे भी पढ़ें : मुजफ्फरपुर अंडरवर्ल्ड की इनसाइड स्टोरी-3 : छोटन शुक्ला की हत्या ने बिहार में भूचाल ला दिया

मेरे घर जाने का रास्ता लंगट सिंह कॉलेज के मुख्य बिल्डिंग के सामने से ही था। कॉलेज ग्राउंड पार कर हम अपने घर जाया करते थे। बम धमाकों के करीब दस मिनट बाद जैसे ही हम मुख्य बिल्डिंग की तरफ से घर की ओर भागे, ठीक गांधी पार्क के सामने वाले चबूतरे पर चारों तरफ खून ही खून दिखा। हर तरफ अफरा तफरी मची थी। वहीं पता चला कि चबूतरे पर जिसकी लाश है वही गब्बर सिंह था। पहली और आखिरी बार गब्बर सिंह को वहीं देखा।

बगल में बाल्टी में रखा था बम : सबसे आश्चर्य इस बात का था कि गब्बर सिंह को भी पता था कि आज उस पर हमला होने वाला है। वह भी पूरी तैयारी के साथ कैंपस में था। खुले कैंपस में चबूतरे पर बैठकर वह धूप सेंक रहा था। जहां उसकी हत्या हुई ठीक वहीं पर बाल्टी में उसने बम रखा हुआ था। मेरा अपना मानना है कि गब्बर सिंह के भी दिलो दिमाग पर भी वही गाना छाया हुआ था..गब्बर सिंह यह कहकर गया जो डर गया वो मर गया। इसीलिए वह बेखौफ अंदाज में अपने दुश्मनों को चुनौती देते हुए वहां खुले चबूतरे पर बैठा था। पर अपराधियों ने गांधी उद्यान में पीछे से उसपर हमला किया। एक के बाद एक कई बम दागे गए और गब्बर सिंह के आतंक का खात्मा हुआ।

इसके बाद तो जैसे कैंपस में हत्याओं का दौर शुरू हो गया। चुन-चुनकर एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वियों की हत्या शुरू हुई। कई-कई दिनों तक कॉलेज और यूनिवर्सिटी बंद रहे। कॉलेज और यूनिवर्सिटी का हॉस्टल अपराधियों की पनाहगार बनी। हाल यह था कि पुलिस भी हॉस्टल के अंदर जाने से घबराती थी। इन दबंग छात्रों को अशोक सम्राट, छोटन शुक्ला, रघुनाथ पांडे, हेमंत शाही जैसे लोगों का अघोषित संरक्षण भी मिला था। मानस चौधरी और बबलू त्रिवेदी का उत्थान इसी दौर में हुआ था।

प्रोफेसर बागेश्वरी बाबू की हत्या ने चौंकाया : यही वह दौर था जब पूरे बिहार में शिक्षकों पर भी हमले शुरू हुए। ट्यूशन और कोचिंग करने वाले प्रोफेसरों से रंगदारी वसूली जाने लगी। सबसे सम्मानजनक पेशा समझा जाने वाले प्रोफेसर्स डर के साए में रहने लगे। प्रोफेसर्स से रंगदारी मानने की घटना ने पूरे बिहार को हिला कर रख दिया। इसी बीच लंगट सिंह कॉलेज कैंपस में वरिष्ठ प्रोफेसर बागेश्वरी बाबू की हत्या हो गई। कॉलेज हॉस्टल में अवैध रूप से रह रहे आउट साइडर्स के खिलाफ उनकी सख्ती और विरोध छात्रों को रास नहीं आई। मनोविज्ञान के प्रोफेसर वागेश्वरी प्रसाद सिंह दबंग छात्रों का मनोविज्ञान पढ़ नहीं सके। वे लंगट सिंह कॉलेज के ड्यूक हॉस्टल के अधीक्षक भी थे। उन्होंने हॉस्टल को अपराध मुक्त करने की ठानी और कड़ी कार्रवाई की।

इसे भी पढ़ें : मुजफ्फरपुर के अंडरवर्ल्ड की इनसाइड स्टोरी -4 : एक गद्दार ने की भुटकुन शुक्ला की हत्या

पुलिस की भी उन्होंने मदद ली। पर जानबूझकर या फिर बाहर बैठे आकाओं के इशारे पर मुजफ्फरपुर पुलिस ने कभी हॉस्टल के अंदर कदम नहीं रखा। प्रो. बागेश्वरी प्रसाद अकेले संघर्ष करते रहे। पर दबंग छात्रों ने उन्हें ही रास्ते से हटा दिया। साल 1994 में कार्तिक पूर्णिमा के दिन कॉलेज कैंपस में मॉर्निंग वॉक कर रहे बागेश्वरी बाबू को गोली मार दी गई। इस हत्या ने जहां एक तरफ कैंपस में अपराधियों के हौसले बुलंद कर दिए, वहीं दूसरी तरफ शिक्षकों में भय का माहौल पैदा हो गया। जो चंद शिक्षक कैंपस को अपराध मुक्त बनाने का संकल्प लेकर खड़े थे, उन्होंने चुप रहने में ही भलाई समझी। यह कैंपस के इतिहास की पहली और आखिरी घटना थी, जिसमें किसी शिक्षक की हत्या कैंपस के अंदर की गई। इस हत्या का परिणाम यह हुआ कि बागेश्वरी बाबू शहीद माने गए और आम छात्रों में दबंगों के खिलाफ आक्रोश पैदा हुआ।

एक निर्दोष शिक्षक की हत्या ने आम छात्रों का एक तरह से कहें तो हृदय परिवर्तन किया और कैंपस की गुंडगार्दी अपने आप कम होती गई। पुलिस की सख्ती भी बढ़ाई गई। कैंपस में पुलिस चौकी खुल गई। दबंग छात्र कैंपस के बाहर से अपनी गतिविधियों का संचालन करने लगे। हालांकि मानस चौधरी और बबलू त्रिवेदी गैंग के बीच यदा-कदा झड़प की खबरें आती रही। इसी दौर में लंगट सिंह कॉलेज के दो हॉस्टल बंद कर दिए गए। लंगट हॉस्टल और न्यू हॉस्टल को सीआरपीएफ के हवाले कर दिया गया। यहां सीआरपीएफ कैंप बना दिया गया। सिर्फ ड्यूक हॉस्टल में ही छात्रों के लिए जगह उपलब्ध थी। सीआरपीएफ कंपनी के कैंपस में आ जाने के बाद निश्चित तौर पर कैंपस में संगठित अपराधियों के गैंग पर लगाम लगी।

कैंपस के बार चल रही थी आदवत : कैंपस में भले ही शांति थी, लेकिन कैंपस के बाहर वर्चस्व की जंग बदस्‍तूर जारी थी। बृजबिहारी दलितों और पिछड़ी जातियों का रॉबिन हुड बन चुका था। उसकी सीधी अदावत भूमिहार दबंगों से थी। बृजबिहारी को जहां एक तरफ शहर के बनियों का समर्थन हासिल था, वहीं पटना की राजनीति में भी उसने पैठ बना ली थी। उधर मिनी नरेश की हत्या और उसकी हत्या का बदला लेने के बाद अशोक सम्राट भी मुजफ्फरपुर में कम दिलचस्पी रखने लगा था। इसका सीधा फायदा मिला छोटन शुक्ला को। छोटन शुक्ला से अधिक दहशत उसके छोटे भाई भुटकुन शुक्ला की थी।

जातियों में बंटा अंडरवर्ल्ड : 90 के शुुरुआती दौर में मुजफ्फरपुर का अंडरवर्ल्ड जातियों में पूरी तरह वर्गीकृत हो चुका था। अंडरवर्ल्ड के बड़े नाम राजनीतिक संरक्षण की जुगत में थे। संगठित अपराध का दौर अपने चरम पर था। एक तरफ बृजबिहारी अपने गैंग को शूटर्स के जरिए मजबूत करने में जुटा था, वहीं छोटन शुक्ला ने भूमिहार और भूमिहार ब्राह्मण जाति के युवाओं के दम पर अपनी पकड़ मजबूत कर रखी थी। दोनों के बीच सीधी अदावत चल रही थी। शहर दो भागों में विभाजित हो चुका था।

एक छोर यानि बटलर के इस तरफ लेनिन चौक, छाता चौक, गन्नीपुर, खबड़ा, कॉलेज और यूनिवर्सिटी कैंपस, नया टोला, अघोरिया बाजार चौक, मिठनपुरा, रामदयालु क्षेत्र में शुक्ला ब्रदर्स की तूती बोलती थी, जबकि माड़ीपुर से लेकर भगवानपुर और बैरिया बस स्टैंड का क्षेत्र अघोषित रूप से बृज बिहारी के हिस्से था। दोनों तरफ मौके की तलाश रहती थी। जो जिसके क्षेत्र में आया दोबारा वापस नहीं गया। इसी बीच टाउन थाना के नजदीक छोटन शुक्ला पर हमला हुआ। गोलीबारी में वो बच गए, पर चंद दिनों बाद ही बृजबिहारी पर हमला हो गया। बृजबिहारी भी हमले में बच गए, लेकिन उनका बॉडिगार्ड पवन मारा गया।

भूमिहार बनाम पिछड़ी जाती : 90 के दशक के शुरुआती वर्षों में जबर्दस्त मारकाट के बाद भूमिहारों को अहसास हो गया था कि आपसी रंजिश में उनकी स्थिति कमजोर हो रही है। क्योंकि चुनचुन कर पहले तो बेगुसराय के भूमिहारों को मारा गया फिर स्थानीय भूमिहारों पर भी हमले हुए। राजनीतिक रूप से भी यहां दो गुट थे। एक गुट का प्रतिनिधित्व कर रहे थे रघुनाथ पांडेय, जबकि दूसरे गुट के सरताज थे ललितेश्वर प्रसाद शाही। इन्हें लोग एलपी शाही के नाम से अधिक जानते थे। इन्हीं के एकलौते थे बेटे थे हेमंत शाही।

पूरे तिरहूत इलाके में हेमंत शाही अपने पिता के दम पर एकछत्र राज चाहते थे। हर छोटे बड़े ठेकों और नीलामी में उनका सीधा हस्तक्षेप था। इस वक्त तक वो वैशाली से एमएलए बन चुके थे। जबकि पिता एलपी शाही केंद्र की राजनीति में उभार पर थे। एलपी शाही 1980 में बिहार विधानसभा के सदस्य निर्वाचित हुए थे और वर्ष 1984 में मुजफ्फरपुर से लोकसभा सदस्य निर्वाचित हुए। वर्ष 1988 में वे राजीव गांधी के मंत्रिमंडल में केंद्रीय शिक्षा एवं संस्कृति मंत्री रहे। शुक्ला ब्रदर्श के ऊपर एलपी शाही और हेमंत शाही का हाथ था।

मार्च 1992 – हेमंत शाही की हत्या : मुजफ्फरपुर का अंडर वर्ल्ड चुपचाप अपनी अदावत और वर्चस्व की जंग में जुटा था। छोटन शुक्ला और बृजबिहारी पर हमले के बाद कोई सीधी लड़ाई में नहीं उलझ रहा था, क्योंकि बृजबिहारी और छोटन शुक्ला दोनों ही राजनीति की तरफ पैर बढ़ा चुके थे। इसी बीच एक बड़ी वारदात ने बिहार की राजनीति में भूचाल ला दिया। वैशाली जिले के गोरौल प्रखंड में एक टेंडर विवाद में गांव के ही पिछड़ी जाति के दबंगों ने एमएलए हेमंत शाही की दिनदहाड़े हत्या कर दी। 28 मार्च 1992 को हेमंत शाही एक मेले के टेंडर को लेकर गोरौल प्रखंड में थे। यहीं उनका गांव के ही पिछड़ी जाति के लोगों से विवाद हुआ। वे टेंडर को हथियाना चाहते थे, लेकिन हेमंत शाही अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर टेंडर अपने पक्ष में करना चाहते थे।

आपसी विवाद बढ़ने के बाद पिछड़ी जाति के दबंगों ने ब्लॉक आॅफिस में हेमंत शाही पर फायर झोंक दिया। दोनों तरफ से गोलियां चली। हेमंत शाही बुरी तरह घायल हुए। उन्हें उनके समर्थकों ने जिप्सी में लादकर मुजफ्फरपुर पहुंचाया, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका। 30 मार्च को उनकी मौत हो गई। इस मौत ने मुजफ्फरपुर को सुलगा दिया। जमकर आगजनी हुई। सरकारी वाहन फूंक दिए गए। कई दिनों तक शहर बंद रहा। हर तरफ दहशत का माहौल था। अनजाने भय से लोग सहमे हुए थे। क्षेत्र के अगड़ी जाति के सबसे बड़े और दबंग पॉलिटिशियन की हत्या हो चुकी थी।

बाहुबली आनंद मोहन की इंट्री : इसी बीच मुजफ्फरपुर अंडरवर्ल्ड में इंट्री हुई कोसी क्षेत्र के बाहुबली आनंद मोहन की। इन्हें साथ मिला शुक्ला ब्रदर्श का। 1980 में आनंद मोहन ने अपनी पार्टी का गठन किया था। नाम रखा था क्रांतिकारी समाजवादी पार्टी। इसी पार्टी से उन्होंने लोकसभा का चुनाव लड़ा पर कभी चुनाव जीत न सके। 1990 में उन्होंने जनता दल से विधानसभा का चुनाव लड़ा और विजयी हुए। इसी दौर में वो छोटन शुक्ला के संपर्क में आए और तिरहुत क्षेत्र में अपनी पार्टी के साथ पांव जमाना चाहा। आनंद मोहन और छोटन शुक्ला की दोस्ती ने मुजफ्फरपुर के अंडरवर्ल्ड के इतिहास में भूमिहार और राजपूत जातियों का मिलन करवाया। पहली बार भूमिहार और राजपूत एक साथ अपने अस्तित्व की लड़ाई में साथ आए।

उधर, एमएलए हेमंत शाही की हत्या के बाद खाली हुई सीट पर दोबारा चुनाव हुए। खुले तौर पर लड़ाई भूमिहार और यादवों की थी। छोटन शुक्ला, आनंद मोहन की जोड़ी ने हेमंत शाही की पत्नी वीणा शाही को भारी मतों से चुनाव जितवाया। जनता दल से अलग होकर 1993 में आनंद मोहन ने बिहार पीपुल्स पार्टी की स्थापना की। साल 1994 में आनंद मोहन ने वैशाली लोकसभा सीट के उपचुनाव में इसी पार्टी के बैनर तले अपनी पत्नी लवली आनंद को खड़ा किया। छोटन शुक्ला का इस क्षेत्र में पूरा दबदबा था। लवली आनंद को खुलकर समर्थन मिला। वो चुनाव जीत गई।

दरअसल छोटन शुक्ला आनंद मोहन के जरिए राजनीति में आने की पूरी तैयारी कर चुके थे। भूमिहार और राजपूत जातियों के गठबंधन ने बिहार में सियासी भूचाल ला दिया था। सबसे अधिक परेशान लालू प्रसाद यादव थे। क्योंकि तिरहूत क्षेत्र में उन्हें अपनी स्थिति कमजोर लगने लगी थी। 1995 में बिहार विधानसभा के चुनाव होने थे।

छोटन शुक्ला का राजनीतिक कद : छोटन शुक्ला की सबसे बड़ी खासियत सभी को मिलाकर चलने की थी। इसका उन्हें फायदा भी मिला। पहली बार राजपूत और भूमिहार एक साथ थे। इसका सीधा फायदा छोटन शुक्ला के राजनीतिक कद को मिल रहा था। उनका राजनीतिक कद लगातार बढ़ रहा था। वहीं पूरे बिहार में छोटन शुक्ला के छोटे भाई भुटकुन शुक्ला की तूती बोल रही थी। कई मामलों में वह जेल में भी थे, लेकिन भुटकुल शुक्ला के बारे में कई किंवदंतियां आज भी मुजफ्फरपुर की फिजाओं में तैरती रहती हैं। कहा जाता था कि भुटकुन शुक्ला अपने दुश्मनों से बचने के लिए खुद ही जेल में रहते थे। जब उन्हें बाहर आना होता था आते थे, फिर वहीं चले जाते थे। मुजफ्फरपुर सेंट्रल जेल ही उनका सुरक्षित ठिकाना था।

यह भी कहा जाता है कि वो सिर्फ किसी की हत्या करने के लिए बाहर आते थे। इसी तरह की किंवदंतियों ने भुटकुन शुक्ला को अंडरवर्ल्ड का बेताज बादशाह बना दिया था। उधर, धीरे-धीरे छोटन शुक्ला राजनीति की ओर मुखातिब हो रहे थे। उनकी नजर 1995 के बिहार विधानसभा चुनाव पर थी। यह बात उनके दुश्मनों को नागवार गुजर रही थी। छोटन शुक्ला ने पूर्वी चंपारण के केशरिया विधानसभा, जो एक भूमिहार बाहुल्य क्षेत्र था, वहां से चुनाव लड़ने की पूरी तैयारी की थी। वो आनंद मोहन की पार्टी बिहार पीपुल्स पार्टी के उम्मीदवार थे।

वर्ष 1994 – छोटन शुक्ला की हत्या : बिहार विधानसभा के चुनाव नजदीक थे। भूमिहार और राजपूत एकता ने यादवों की नींद उड़ा रखी थी। सबसे अधिक परेशान बृजबिहारी प्रसाद थे। बृजबिहारी ने अकेले दम पर पूरे तिरहूत क्षेत्र को पिछड़ी जातियों की राजनीति का गढ़ बना दिया था। मुजफ्फरपुर की राजनीति भूमिहार बनाम बनिया की होती है। 1985 से 1995 तक रघुनाथ पांडे ने इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। जबकि 1995 से 2010 तक विजेंद्र चौधरी विधायक रहे। विजेंद चौधरी ने बृजबिहारी के दम पर ही चुनाव जीता था। छोटन शुक्ला लगातार अपने क्षेत्र का दौरा कर रहे थे। अपने क्षेत्र में जाने का एक ही रास्ता था, वह रास्ता मुजफ्फरपुर के दूसरे क्षेत्र होकर जाता था।

इस क्षेत्र में बृजबिहारी का राज था। 4 दिसम्बर 1994 को जब छोटन शुक्ला अपने साथियों के साथ अपने विधानसभा क्षेत्र से चुनावी बैठक और प्रचार कर लौट रहे थे तो बृजबिहारी गली में चारों तरफ से घेरकर उनपर एके 47 की बौछार कर दी गई। छोटन शुक्ला के साथ उनके बॉडीगार्ड भी मारे गए। सीधा आरोप बृजबिहारी पर लगा। बताते हैं कि छोटन शुक्ला की हत्या के बाद शहर के एक छोर पर कई घरों में चूल्‍हा नहीं जला, जबकि बृजबिहारी के क्षेत्र में पटाखों की गूंज सुनाई दी। जश्न हुआ।

छोटन शुक्ला की हत्या के बाद सुलगा मुजफ्फरपुर : छोटन शुक्ला की हत्या के बाद मुजफ्फरपुर एक बार फिर सुलग उठा। जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की वो घटना घट गई। बिहार की राजनीति में एक भूचाल आ गया। छोटन शुक्ला की शवयात्रा निकाली गई। एनएच-24 होकर उनकी शवयात्रा उनके पैतृक गांव की ओर प्रस्थान कर रही थी। खबड़ा होकर यह शवयात्रा निकाली थी। हजारों हजार की संख्या में छोटन शुक्ला के समर्थक इस शवयात्रा में शामिल थे। इसी बीच गोपालगंज के जिलाधिकारी जी कृष्णैया की गाड़ी वहां से गुजर रही थी। भीड़ से साइड लेने के लिए ड्राइवर ने हॉर्न बजाया। आक्रोशित भीड़ और उग्र हो गई। किसी ने यह नहीं देखा कि कार में कौन बैठा है।

बत्ती लगी गाड़ी देखकर भीड़ ने तोड़फोड़ शुरू कर दी। देखते-देखते चंद मिनट में गोपालगंज के जिलाधिकारी की भीड़ ने हत्या कर दी। उन्हें बेहद करीब से गोली मारी गई थी। बिहार में मॉब लिंचिंग की यह सबसे बड़ी घटना थी। पूरे बिहार में तहलका मच गया। इस हत्याकांड की गूंज दिल्ली तक पहुंच गई। स्पेशल टीम ने बिहार में कैंप किया। पूरे देश में अंडरवर्ल्ड डॉन छोटन शुक्ला और जिलाधिकारी जी कृष्णैया की हत्या गूंजने लगी। जिलाधिकारी हत्या के मुख्य आरोपी भुटकुन शुक्ला, आनंद मोहन, लवली आनंद, मुन्ना शुक्ला को बनाया गया। साथ ही कई अन्य लोगों पर भी मुकदमा दर्ज किया गया।

छोटन शुक्ला की हत्या ने मुजफ्फरपुर के अंडरवर्ल्ड के साथ-साथ पूरे बिहार के अंडरवर्ल्ड को अंदर से हिला कर रख दिया था। छोटे भाई भुटकुन शुक्ला के क्रोध से पूरा अंडरवर्ल्ड वाकिफ था। छोटन शुक्ला की हत्या के बाद बिहार का अंडरवर्ल्ड साजिशों और गैंगवार में उलझता ही गया।

कैसे लिया गया छोटन शुक्ला की हत्या का बदला, कहां गया अंडरवर्ल्ड डॉन अशोक सम्राट, कैंपस में किस तरह उगी छात्रों की नई दबंग पौध। जल्द पढ़ाऊंगा अगली कड़ी में। साथ ही दिखाऊंगा अशोक सम्राट की कुछ ऐसी एक्सक्लूसिव तस्वीर जो शायद पहली बार पब्लिक डोमेन में होगी।

लेखक कुणाल वर्मा वरिष्‍ठ एवं जानेमाने पत्रकार हैं. वे आई नेक्‍स्‍ट, दैनिक जागरण समेत तमाम बड़े संस्‍थानों में वरिष्‍ठ पदों पर रह चुके हैं. फिलवक्‍त आज समाज के समूह संपादक के रूप में सेवारत हैं.