मुजफ्फरपुर अंडरवर्ल्ड की इनसाइड स्टोरी-6 : पूर्व मंत्री की हत्या के बांद शांत हो गया तिरहुत

कुणाल वर्मा

: बृजबिहारी प्रसाद की पहचान होते ही फायरिंग से गूंज उठा अस्‍पताल : मुजफ्फरपुर अंडरवर्ल्ड की इनसाइड स्टोरी के भाग 5 में आपने पढ़ा था कि कैसे चंपारण के सबसे ताकतवर नेता की एके47 की बौछार कर हत्या कर दी गई थी। कैसे उसके भतीजे ने इस हत्या का बदला लेने का खुला ऐलान किया था। कैसे इस हत्याकांड ने उत्तर प्रदेश, मुजफ्फरपुर, तिरहुत और कोसी क्षेत्र के अंडरवर्ल्ड के बड़े नामों को एकजुट कर दिया था। इन सभी का एक ही मकसद बन गया था बिहार के बाहुबली नेता बृजबिहारी प्रसाद की हत्या।

कैंपस की राजनीति की, कैंपस में ही फंस गए : मैंने आपको बताया था कि मुजफ्फरपुर में दो बड़े कैंपस थे, जहां से अपराध का रास्ता खुलता था। एक था लंगट सिंह और बिहार यूनिवर्सिटी का संयुक्त कैंपस, दूसरा था शहर के दूसरे छोर पर स्थापित एमआईटी यानि मुजफ्फरपुर इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी का कैंपस। बृजबिहारी प्रसाद इसी एमआईटी की पैदाइश थे। इस कैंपस ने उन्हें इतना सशक्त कर दिया था कि नब्बे के दशक में वो उत्तर बिहार के सबसे बाहूबली नेता बन चुके थे।

पिछड़ों और दलितों की राजनीति करने वाले बृजबिहारी प्रसाद ने अपनी छवि रॉबिनहुड की बना रखी थी। इसीलिए कम समय में उनका वोट बैंक काफी मजबूत हो चुका था। यही कारण है कि वो लालू यादव के कोर टीम के हिस्सा थे। हाजीपुर से लेकर चंपारण तक में उन्होंने राष्‍ट्रीय जनता दल (आरजेडी) को मजबूती देने में अहम भूमिका निभाई थी। लालू यादव से उनकी नजदीकियां इतनी अधिक थी कि बृजबिहारी प्रसाद उनके घर के सदस्य जैसे थे।

इस नजदीकी का एक और खुलासा पिछले साल तब हुआ था जब बिहार की राजनीति नई करवट ले रही थी। नीतीश कुमार ने लालू यादव से हाथ मिलाकर बिहार में नई सरकार बना ली थी। लालू यादव के दोनों सुपुत्र बिहार मंत्रिमंडल में ऊंचे ओहदे पर थे। लालू-नीतीश की इस दोस्ती से सबसे अधिक परेशान बीजेपी थी। खोज-खोज कर एक दूसरे पर आरोप लगाए जा रहे थे। तभी सुशील मोदी ने एक और धमाका करते हुए बताया था कि 23 मार्च 1992 में बृजबिहारी प्रसाद की पत्नी रमा देवी ने लालू यादव के बड़े पुत्र तेज प्रताप यादव को गिफ्ट में 13 एकड़ से ज्यादा जमीन दी थी। उस वक्त तेजप्रताप करीब तीन साल के थे।

इस गिफ्ट के दस्तावेजों को गौर से पढ़ेंगे तो आपको बृजबिहारी प्रसाद की फैमिली और लालू यादव की फैमिली की नजदिकियों को समझने में और आसानी होगी। लालू यादव के बड़े बेटे को गिफ्ट में दी गई जमीन मुजफ्फरपुर के किशनगंज मौजा में थी। दो भूखंड थे। एक भूखंड का रकबा नौ एकड़ 24 डिसमिल है और दूसरे का तीन एकड़ 88 डिसमिल। गिफ्ट के दस्तावेजों में अंकित है कि तेज प्रताप नाबालिग है, लेकिन वो रमा देवी का यथासंभव ख्याल रखता है। रमा देवी ने उसके बर्ताव से खुश होकर उसे उपहार में जमीन देने का फैसला किया है।

बताते चलें कि सुशील मोदी के खुलासे के बाद रमा देवी ने भी बिहार की मीडिया में स्वीकार किया था कि हां उन्होंने अपने पति के कहने पर यह जमीन तेजप्रताप को वर्ष 1992 में गिफ्ट की थी। अब आप समझ सकते हैं कि बृजबिहारी प्रसाद और लालू यादव में कितने गहरे पारिवारिक रिश्ते थे। ये रिश्ते पारिवारिक होने के साथ-साथ राजनीतिक भी काफी गहरे थे। यही कारण था कि लालू यादव की सरकार में बृजबिहारी प्रसाद की तूती बोलती थी।

90 के दशक में पूरा देश नई उद्योग और विज्ञान क्रांति के दौर से गुजर रहा था। ऐसे में सबसे अधिक विकास की संभावनाएं इसी क्षेत्र में थी। ऐसे में बृजबिहारी प्रसाद को बिहार के विज्ञान एवं प्रोद्यौगिकी मंत्री का कार्यभार सौंपा गया था। यह विभाग उस वक्त सबसे अधिक कमाऊ विभाग के रूप में जाना जाता था। बृजबिहारी प्रसाद इंजीनियरिंग बैकग्राउंड के स्टूडेंट थे, इसलिए उनके लिए भी यह विभाग काफी फलदायी सिद्ध हुआ। बिहार में भले ही विज्ञान और प्रौद्योगिकी में तरक्की नहीं हुई, लेकिन इस विभाग के नेता सहित तमाम अफसरों, इंजीनियरिंग कॉलेज के प्राचार्यों और कर्ता धर्ताओं ने खूब तरक्की की।

इसी बीच वर्ष 1996 में बिहार में इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा में बड़ा घोटाला हुआ। मीडिया द्वारा इस घोटाले की खबर ने पूरी बिहार की सत्ता को हिला कर रख दिया। क्या था यह घोटाला, कैसे हुआ था घोटाला, कैसे शातिरों की एक पूरी कौम ने बिहार को बर्बाद करने के लिए इस घोटाले को अंजाम दिया था। यह एक बड़ी कहानी है। जिसे फिर कभी मौका मिला तो आप सभी को बताऊंगा।

फिलहाल इतना बता दूं कि एक पूरे नेक्सस ने बिहार कंबाइंड इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा का पूरा सिस्टम ही हैक कर लिया था। इसमें सबसे बड़ी भूमिका निभाई थी बृजबिहारी प्रसाद के सबसे खास रहे आरसी विकल ने। बहुत कम लोगों को पता होगा कि बृजबिहारी प्रसाद दरअसल डॉ. बृजबिहारी प्रसाद थे। प्रसाद ने आरसी विकल के गाइडेंस में ही पीएचडी की डिग्री प्राप्त की थी। बृजबिहारी प्रसाद की कृपा से ही आरसी विकल बिहार कंबाइंड इंजीनियरिंग परीक्षा के को-कनेवनर बनाए गए थे।

सीबीआई की रिपोर्ट कहती है कि को-कनेवर का उस वक्त कोई पोस्ट ही नहीं था, लेकिन बृजबिहारी प्रसाद की हनक ने सभी नियमों को ताक पर रख दिया था। जो लोग इस वक्त 30 से 40 उम्र के या उससे अधिक होंगे उन्हें पता होगा कि उस दौर में कैसे यह बात आम थी कि 50 हजार से एक लाख या दो लाख में इंजीनियर बना दिए जाते थे। प्रवेश परीक्षा में ही खेल कर दिया जाता था। बेहद शतिराना अंदाज में आरसी विकल ने प्रवेश परीक्षा में एक ऐसे सिस्टम को डेवलप कर दिया था कि जिसे नाम दिया गया था पैसा फेंको तमाशा देखो। सीबीआई जांच के दौरान 1996 की प्रवेश परीक्षा में करीब 246 बच्चे आइडेंडिफाई किए गए थे, जिन्होंने इसी नेक्सस के जरिए परीक्षा दी और विभिन्न इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन लिया।

अंदाजा लगाइए इससे पहले कितने बच्चे पास भी कर चुके होंगे। जब इस नेक्सस का खुलासा हुआ तो बिहार सरकार हिल गई। लालू प्रसाद यादव को राजनीतिक प्रेशर में सीबीआई जांच की अनुशंसा करनी पड़ गई। इस स्कैम के बाद लालू यादव और बृजबिहारी प्रसाद में तल्खी काफी बढ़ गई थी। अंदर के सूत्र बताते हैं कि लालू यादव और उनकी टीम को यह बात नागवार गुजरी कि अकेले-अकेले बृजबिहारी प्रसाद पूरे बिहार के साइंस और प्रौद्योगिकी का इतना उत्थान कैसे कर गए?

खैर, लालू यादव द्वारा सीबीआई जांच की अनुशंसा करते ही बृजबिहारी प्रसाद और लालू यादव का मनमुटाव खुलकर सामने आ गया। मीडिया में बृजबिहारी प्रसाद ने कुछ ऐसा बयान दे डाला, जिसमें इस बात का जिक्र था कि सिर्फ प्रसाद ही इस स्कैम में शामिल नहीं, बल्कि कई बड़े नाम भी हैं। सीबीआई जांच शुरू हुई तो बृजबिहारी प्रसाद को अपने मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा गया।

उन्‍हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। न्यायिक हिरासत में उनके साथ वही हुआ जो आज तक सभी नेताओं को होता आया है। बृजबिहारी प्रसाद की सेहत खराब हो गई। सीने में जलन हो गई। दर्द होने लगा। और उन्हें पूरे तामझाम के साथ पटना के सबसे प्राइम लोकेशन में स्थित इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल साइंस (आईजीआईएमएस) में भर्ती करा दिया गया।

तैयार हुआ फुलप्रूफ प्लान : (मर्डर की यह कहानी पुलिस सूत्रों, हत्याकांड में दर्ज एफआईआर और अंडरवर्ल्ड से जुड़े कुछ सूत्रों के आधार पर है) उधर, अपने करीबियों की हत्या का बदला लेने की संयुक्त रूप से कसम खाई जा चुकी थी। बदला भी ऐसा लेना था कि पूरा बिहार देखे। ऐसे में बृजबिहारी प्रसाद को आईजीआईएमएस में ही मौत के घाट उतारने की व्यूह रचना की गई। आईजीआईएमएस के जिस वॉर्ड के जिस कमरे में बृजबिहारी को रखा गया था उसकी बनावट कुछ ऐसी थी कि वहां एक साथ धावा बोलना असान नहीं था, क्योंकि वहां तक पहुंचने में काफी समय लगता।

दूसरा, बृज बिहारी प्रसाद की सुरक्षा के लिए वहां बिहार पुलिस के कमांडो भी तैनात थे। बृजबिहारी प्रसाद के अपने लोग भी उसके आसपास ही रहते थे। बताते हैं कि ऐसे में तैयार किया गया शंकर शंभू को। वही शंभू जिसकी चर्चा मैंने पहले की थी, जो बाद में देहरादून से पकड़ा गया। भुटकुन शुक्ला की हत्या के बाद अंदरखाने शंभू बृजबिहारी का खास बना हुआ था। उस वक्त बृजबिहारी प्रसाद ने आईजीआईएमएस को ही अपना वर्किंग प्लेस बना लिया था। वहीं से वह अपनी सत्ता चला रहा था।

शंभू को टास्क मिला था पूरी रेकी करने का। साथ ही तय समय पर किसी तरह बृजबिहारी प्रसाद को हॉस्पिटल के प्रांगण या पार्किंग एरिया तक लाने का। वहां उपयोग किया गया मोबाइल। उस वक्त मोबाइल यूज करना शान की बात मानी जाती थी। चुनिंदा लोगों के पास ही मोबाइल हुआ करता था। वॉर्ड के अंदर मोबाइल का टावर ठीक से नहीं मिलता था, इसलिए तय हुआ कि किसी जरूरी काम से मोबाइल बृजबिहारी प्रसाद तक पहुंचाया जाएगा, फिर बात करने के बहाने उन्हें नीचे लॉन में ले आया जाएगा।

सबकुछ प्लान के साथ ही हुआ। दिन तय हुआ 13 जून 1998। वक्त तय हुआ शाम के आठ बजे का। जगह तय हुई हॉस्पिटल का खुला कैंपस। जून के महीने में वैसे भी शाम को लोग टहलने निकलते हैं। जून के महीने में आठ बजे का समय न तो बहुत उजाला होता है और न बहुत अधिक अंधेरा। ऐसे में किसी की पहचान भी आसान है और निकल भागना भी आसान। तय समय के अनुसार बृजबिहारी प्रसाद अपने तीन-चार बॉडीगार्ड और उनसे मिलने आए क्षेत्र के लोगों के साथ मोबाइल पर बात करते हुए नीचे आए।

ठीक 8 बजकर 15 मिनटर पर एक सूमो गाड़ी जिसका नंबर था बीआर 1पी-1818, बेली रोड की तरफ से हॉस्पिटल के साउथ गेट से अंदर आई। इसी गाड़ी के साथ उजले रंग की अंबेसडर गाड़ी भी थी। बृजबिहारी प्रसाद और उनके सहयोगी और बॉडीगार्ड जहां खड़े थे वहां से ठीक बीस कदम पीछे दोनों गाड़ी रुकी। इससे पहले मैदान में बैठे कुछ लोग भी गाड़ी के अंदर प्रवेश करते ही हरकत में आ गए थे। वो पीछे की तरफ से आगे बढ़े, जबकि गाड़ी सामने की तरफ से आ रही थी। गाड़ी रुकते ही सबसे पहले बृजबिहारी प्रसाद की पहचान की गई।

पहचान होते ही ताबड़तोड़ फायरिंग की आवाज से पूरा हॉस्पिटल कैंपस गूंज गया। जब तब बृजबिहारी प्रसाद और उनके बॉडीगॉर्ड हरकत में आते तब तक गोलियों की बौछार के बीच चारों तरफ खून ही खून पसर गया गया था। अपराधियों ने पिस्तौल, कार्बाइन और एके-47 की बौछार से बृजबिहारी प्रसाद का अंत कर दिया था। इस गोलीबारी में बृजबिहारी प्रसाद के बॉडीगार्ड लक्ष्मेश्वर शाह को भी गोली लगी। शाह भी मौके पर ही मारे गए। प्रसाद के साथ वहां खड़े एक दो और लोगों को गोली लगी। बृजबिहारी की हत्या के बाद अपराधियों ने हवा में गोलियां बरसाई और उसी सूमो और अबेंसडर गाड़ी से निकल गए। प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया था कि उस समय हमलावरों ने हत्या के बाद जय बजरंगबली का जयघोष भी किया था।

मुजफ्फरपुर में सन्नाटे के बीच गोलियों की गूंज : इधर बृजबिहारी की हत्या हुई उधर पूरे बिहार में कोहराम मच गया। पूरा हॉस्पीटल परिसर पुलिस छावनी में तब्दील हो गया। पटना से लेकर पूरे तिरहुत क्षेत्र में अलर्ट जारी कर दिया गया। बृजबिहारी प्रसाद की हत्या का मैसेज फ्लैश होते ही मुजफ्फरपुर में आनन फानन में पुलिस की अतिरिक्त टुकड़ी को तैनात कर दिया गया। उस वक्त मोबाइल, सोशल मीडिया और टीवी चैनल्स का जमाना नहीं था। लेकिन रेडियो से शाम के नौ बजे के समाचार प्रसारण के बाद पूरा मुजफ्फरपुर गोलियों के धमाकों से गूंजने लगा।

माड़ीपुर से लेकर बैरिया तक सन्नाटा पसर गया था, लेकिन नया टोला से लेकर कलमबाग चौक, कॉलेज और यूनिवर्सिटी कैंपस से लेकर खबड़ा तक में गोलियों की तड़तड़ाहट ने खौफ पैदा कर दिया था। रह-रह कर हर्ष फायरिंग हो रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे दीपावली का जश्न मनाया जा रहा है। आम आदमी घरों में कैद हो गया था। पुलिस लगातार लाउडस्पीकर से शांति बनाने की अपील कर रही थी, पर उसी दोगुने रफ्तार से हवा में गोलियां दागी जा रही थी।

अजब दहशत, खामोशी और हर्ष का माहौल था। पूरे दो से तीन दिन तक रह-रह कर हर्ष फायरिंग की आवाज आती रही। स्कूल कॉलेज बंद करवा दिए गए थे। हर तरफ पुलिस ही पुलिस नजर आ रही थी। मुजफ्फरपुर के मार्केट भी स्वत: बंद थे। अनजाने भय से हर कोई आशंकित था। मुजफ्फरपुर के अंडरवर्ल्ड का अब तक सबसे खौफनाक हत्याकांड हुआ था। वह भी बिहार की राजधानी पटना में।

पुलिस भी हैरान थी : उधर, पटना में 13 जून 1998 को पुलिस का शायद ही ऐसा कोई अधिकारी हो जो हॉस्पिटल में मौजूद न हो। शाम 8.15 में यह हत्या हुई और पटना पुलिस की पहली टीम को घटनास्थल पर पहुंचने में 45 मिनट का वक्त लग गया। इस बीच पूरे हॉस्पिटल कैंपस में अफरातफरी मच चुकी थी। हर कोई बदहवास इधर-उधर भाग रहा था। कई मरीजों के परिजन उन्हें लेकर भाग गए थे। चप्पल से लेकर जूते तक हर तरफ कैंपस में बिखरा पड़ा था।

रात नौ बजे घटनास्थल पर सबसे पहले पहुंचने वालों में थे शास्त्री नगर पुलिस स्टेशन के इंस्पेक्टर एसएसपी यादव। रात करीब 12 बजे इस हत्याकांड की पहली एफआईआर गर्दनीबाग पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई। एफआईआर नंबर था 336/98। आईपीसी की धार 302/307/34/120बी और 379 के तहत मामला दर्ज हुआ। पहली एफआईआर सहित बाद की जांच में दर्ज नाम में सबसे बड़ा नाम था बाहुबली सूरजभान सिंह, श्रीप्रकाश शुक्ला, मुन्ना शुक्ला, मंटू तिवारी, राजन तिवारी, भूपेंद्र नाथ दूबे, सुनील सिंह सहित अनुज प्रताप सिंह, सुधीर त्रिपाठी, सतीश पांडे, ललन सिंह, नागा, मुकेश सिंह, कैप्टन सुनील उर्फ सुनील टाइगर का।

केस की जांच की कमान दूसरे ही दिन सौंप दी गई आंखफोड़वा कांड से चर्चित हुए पुलिस अधिकारी शशि भूषण शर्मा को। शर्मा उस वक्त डीएसपी सेक्रेटिएट थे। इस वक्त तक शशि भूषण शर्मा अंडरवर्ल्ड डॉन अशोक सम्राट इनकाउंटर के साथ-साथ कई और बड़े एवं चर्चित मामलों में बिहार पुलिस के हीरो बन चुके थे। चूंकि मामला बृजबिहारी प्रसाद जैसे बड़े नाम का था, इसलिए बिहार पुलिस ने एकबार फिर शशि भूषण शर्मा पर भरोसा जताया। शशि भूषण शर्मा ने इस जांच में अपनी पूरी ताकत झोंक दी। तमाम धमकियों की परवाह किए बगैर उन्होंने तीस अक्टूबर 1998 को चार्जशीट दाखिल कर दी।

चार्जशीट में कई धाराएं और लगाई गई। आरोपियों के खिलाफ आईपीसी की धारा 302/307/379/353/333/120बी के अलावा सेक्शन 27 की धाराएं लगाई गई। बाद में सात मार्च 1999 को बिहार सरकार ने मामले को सीबीआई को सौंपने के लिए मेंबर आफ दिल्ली पुलिस एस्टेबलिस्टमेंट को रिक्वेस्ट भेज दी। भारत सरकार के डिपार्टमेंट आफ पर्सनल एंड ट्रेनिंग ने सात अप्रैल 1999 को स्पेशल पॉवर के साथ सीबीआई को मामला जांच के लिए सौंप दिया। कई आरोपी गिरफ्तार हुए। जेल भेज गए। कई जमानत पर रिहा हुए।

सीबीआई ने लंबी जांच की। चार्जशीट दायर हुआ। पटना की निचली अदालत ने 12 अगस्त 2009 में दो पूर्व विधायकों राजन तिवारी और विजय कुमार शुक्ला उर्फ मुन्ना शुक्ला, पूर्व सांसद सूरजभान सिंह सहित 8 अभियुक्तों को इस मामले में दोषी पाया था। इन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई। सभी ने फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। लंबी बहस के बाद सबूतों के आभाव में पटना हाईकोर्ट ने बृजबिहारी हत्याकांड के सभी अभियुक्तों को 25 जुलाई 2014 को बरी कर दिया। न्यायमूर्ति इकबाल अहमद अंसारी और न्यायमूर्ति वीएन सिन्हा की खंडपीठ ने निचली अदालत के फैसले को पूरी तरह खारजि कर दिया।

हाईकोर्ट ने जेल में बंद राजन तिवारी, मंटू तिवारी और मुन्ना शुक्ला को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया। जबकि, जमानत पर चल रहे पूर्व सांसद सूरजभान सिंह, मुकेश सिंह, ललन सिंह, कैप्टन सुनील सिंह को बेल बांड से मुक्त कर दिया। शीर्ष अदालत ने अपने 278 पृष्ठ के फैसले में काफी अहम बातें की। साथ ही सीबीआई की वर्किंग पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि सीबीआई यह साबित नहीं कर पाई कि इन अभियुक्तों ने प्रसाद की हत्या की साजिश रची थी। कोर्ट ने कहा कि सीबीआई ने जिन साक्ष्यों के आधार पर इन अभियुक्तों को हत्याकांड से जोड़ने का प्रयास किया है, उसमें कोई दम नहीं है।

क्या हुआ तिरहुत और मुजफ्फरपुर के अंडरवर्ल्ड का : बृज बिहारी प्रसाद की हत्या के साथ तिरहुत और मुजफ्फरपुर के अंडरवर्ल्ड में शांति छा गई। सबसे अहम बात यह रही कि बृजबिहारी प्रसाद की पत्नी रमा देवी ने अपने पति की हत्या के लिए लालू प्रसाद और उनके सहयोगियों पर सीधा आरोप लगाया। रमा देवी तो मुख्यमंत्री निवास में धरना देने तक पहुंच गई थी। बृजबिहारी की हत्या का सबसे अहम किरदार डॉन श्रीप्रकाश शुक्ला बृजबिहारी हत्याकांड के तीन महीने के अंदर उत्तर प्रदेश एसटीएफ के इनकाउंटर में ढेर कर दिया गया। गाजियाबाद के निकट हुए इस इनकाउंटर ने बिहार और उत्तर प्रदेश में खौफ का बड़ा नाम बन चुके 26 साल के डॉन श्रीप्रकाश शुक्ला का अंत कर दिया।

अरशद वारसी द्वारा अभिनित फिल्म ‘सहर’ कमोबेश श्रीप्रकाश शुक्ला के जीवन पर ही है। मुन्ना शुक्ला का अंडरवर्ल्ड में नाम उनके भाईयों के साथ अनायस ही जुड़ा। वो अपने राजनीतिक जीवन में लग गए। अंडरवर्ल्ड से जुड़े किसी बड़ी घटना में उनका नाम बाद में कहीं नहीं आया। मिनी नरेश, चंदेश्वर सिंह, हेमंत शाही, अशोक सम्राट, छोटन शुक्ला, भुटकुन शुक्ला और बृजबिहारी प्रसाद की हत्या के साथ ही मुजफ्फरपुर संगठित अपराधों से दूर होता गया।

वर्ष 2005 में नितीश कुमार मंत्री बने। इसके बाद पूरे बिहार में अपराधियों से सीधा मुकाबला हुआ। सुशासन का नारा देते हुए बिहार पुलिस ने इनकाउंटर की झड़ी लगा दी। हजारों अपराधी जेल की सलाखों के पीछे डाल दिए गए। जो समझदार से उन्होंने बिहार से बाहर भागने में भलाई समझी। हालांकि स्पेशल टीम का गठन कर इन भगोड़ों को भी खोज-खोज कर मारा गया या पकड़ा गया। मुजफ्फरपुर और तिरहुत का नाम छोटे-मोटे अपराधों में आता रहा। कई गैंगस्टर भी हीरो की तरह सामने आए, लेकिन तत्काल वे ढेर भी हो गए।

संगठित अपराध का पूरा नेक्सस बृजबिहारी प्रसाद की हत्या के साथ खत्म हो चुका था। साल 2010 के बाद इस क्षेत्र में भू माफियाओं का संगठित नेक्सस पनपा। आज यह पूरा क्षेत्र संगठित भू माफियाओं के लिए बदनाम हो चुका है। इसी नेक्सस के तहत अपराध ने फिर से मुजफ्फरपुर में दस्तक दे रखी है। लगातार लाशें गिर रही है। पूर्व मेयर समीर की हत्या भी इसी नेक्सस का नतीजा है। देखना होगा नीतीश कुमार की सरकार उत्तर बिहार की राजधानी कहे जाने वाले मुजफ्फरपुर को कैसे इस नेक्सस से आजाद करवाती है। फिलहाल एक दिन पहले ही यहां की एसएसपी हरप्रीत कौर का डिमोशन कर उनका तबादला कर दिया गया है। सिंघम स्टाइल के लिए फेमस आईपीएस मनोज कुमार को मुजफ्फरपुर की कमान सौंपी गई है।

लेखक कुणाल वर्मा वरिष्‍ठ एवं जानेमाने पत्रकार हैं. वे आई नेक्‍स्‍ट, दैनिक जागरण समेत तमाम बड़े संस्‍थानों में वरिष्‍ठ पदों पर रह चुके हैं. फिलवक्‍त आज समाज के समूह संपादक के रूप में सेवारत हैं.