असम की राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर की तरह यूपी में भी ʺकुछ” होना चाहिए

नरेंद्र श्रीवास्‍तव

: कूड़ा बीनने वालों में तमाम बंग्लादेशी हो सकते हैं : लखनऊ : पीठ पर बोरा और हाथ में लोहे की राड लेकर कूड़ा बीनने वाले आपको अकसर दिख जाते होंगे। इन में महिलाओं  और बच्चों की संख्या ज्‍यादा रहती है। इनसे पूछिये कहां के रहने वाले हैं‚ तो इनका उत्तर बंगाल या असम होगा। यह आपस में बंगाली में बात करते हैं, लेकिन दूसरों से हिन्दी और कभी–कभी तो ठेठ अवधी में बतियाते हैं। इनका आशियाना आमतौर पर नालों के किनारे पन्नी या कपड़ा डालकर रहता है।

लखनऊ में दिलकुशा के पास गोमती नदी के किनारे इनकी अच्छी खासी जनसंख्या रहती है। पहनावे और बोलचाल से ये शुद्ध भारतीय लगते हैं। इनसे बात करने पर लगता है  कि इनका कुनबा राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत है। इनकी छानबीन करने की जरूरत है। इनमें ज्यादातर एक धर्म विशेष से ताल्लुक रखने वाले होते हैं। लेकिन अपना नाम यह बदल कर ही बताते हैं। इनकी जांच की जरूरत है। जांच किये बगैर इन्हें गैर-भारतीय नहीं कहा जा सकता।

असम की तरह यूपी़ में भी जांच हो जाए तो दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा। असम में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर की तरह यहां भी ʺकुछ‘‘ होना चाहिए। भारतीय जनता पार्टी नेता और गोरखपुर विश्वविद्‍यालय छात्र संघ के अध्यक्ष रह चुके समीर सिंह दावा करते हैं कि कूड़ा बीनने वालों में तमाम बंग्लादेशी हो सकते हैं। लखनऊ के गोमती नगर में हुई एक बड़ी वारदात में भी इन लोगों के शामिल होने की आशंका जताते हैं।

इनका कहना है कि पुलिस में भी उस वारदात में इन्हीं लोगों के हाथ होने की आशंका जताई थी। उनकी मांग है कि असम की तरह राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर की यहां भी जांच हो ताकि घुसपैठिये पहचाने जा सकें। भाजपा समर्थक कहते हैं कि देश को धर्मशाला नहीं बनाया जा सकता। कहीं से कोई आए और यहां का वाशिंदा बन जाए।

दूसरी ओर मानवाधिकार संगठनों से जुड़े लोगों की राय जुदा है। मानवाधिकारों को लेकर करीब 20 वर्षों से सक्रिय राघवेन्द्र कहते हैं कि मानवता से बड़ा कुछ नहीं है। इन्सानियत के सामने धर्म और अन्य चीजें पीछे छूट जाती हैं। राघवेन्द्र का कहना है कि हो सकता है यूपी में भी बंग्लादेशियों की संख्या अधिक हो, लेकिन इनकी पहचान और इन्हें इनके मूल देश में भेजने के लिए मानवाधिकारों का ध्यान रखा जाना चाहिए।

संसद से कोलकाता और सिलचर तक बंग्लादेशी घुसपैठियों को लेकर हंगामा बरपा है। पक्ष विपक्ष एक दूसरे के सामने हैं। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी असम में चिन्हित किये गए 40 लाख के पक्ष में खुलकर सामने आ गई हैं। वह इस मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ विपक्ष को लामबन्द कर रही हैं। इस मामले को वह असम ही नहीं राष्ट्रीय स्तर पर ले जाना चाहती हैं। लेकिन‚ भाजपा इसे दूसरा रंग देकर लोक सभा चुनाव में इसका लाभ उठाना चाहती है।

लाभ तो ममता बनर्जी भी लेना चाहेंगी‚ लेकिन कश्मीर और देश के अन्य इलाकों के हालात को देखते हुए घुसपैठियों का मुद्दा भाजपा को ज्यादा सोहेगा। भाजपा अध्‍यक्ष अमित शाह ने राज्यसभा में  साफ कह दिया है कि देश की सुरक्षा से केाई समझौता नहीं होगा‚ घुसपैठियों को उनके मूल देश जाना ही होगा। इसके बाद माना जा रहा है कि यह मामला अभी और बढ़ेगा।

लेखक नरेंद्र श्रीवास्‍तव उत्‍तर प्रदेश के जानेमाने वरिष्‍ठ पत्रकार हैं.