…यूपी में मात्र तीस सीटों तक सिमट जाएगी भाजपा!

भाजपा

: वोट शेयर में दो फीसदी का उतार-चढ़ाव बदल देगा पूरा समीकरण : विपक्ष की एकता ने मोदी-शाह को मुश्किल में डाला : लखनऊ। उत्‍तर प्रदेश में विपक्षी दलों में यह एकता बरकरार रही तो भाजपा और उसके सहयोगी दलों के सीटों की संख्‍या सिमट कर दो दर्जन तक पहुंच सकती है। यूपी से अपनी कुल सीटों में से एक चौथाई लोकसभा सीट जीतने वाली BJP को सबसे ज्‍यादा झटका यहीं से लगने की संभावना है। केंद्र में भाजपा की सरकार बनवाने में उत्‍तर प्रदेश का सबसे बड़ा रोल रहा, लेकिन अमित शाह और सुनील बंसल ने इस राज्‍य को शतरंज का बिसात बना दिया है।

विचारधारा से जुड़े कार्यकर्ताओं की अनदेखी के साथ संयुक्‍त विपक्ष के वोटों का प्रतिशत भाजपा को हाशिए पर पहुंचा सकता है। अगर वर्ष 2014 के लोक सभा चुनाव में पार्टियों को मिले मतों के प्रतिशत पर नजर डालें तो संयुक्‍त विपक्ष 52 फीसदी वोटों के साथ भाजपा पर भारी पड़ेगा। भाजपा को लोकसभा चुनाव में 42 फीसदी से कुछ ही ज्‍यादा वोट मिले थे, जबकि सपा को 22 फीसदी से ज्‍यादा, बसपा को 19 फीसदी से ज्‍यादा, कांग्रेस को 7 फीसदी से ज्‍यादा वोट मिले थे। रालोद और छोटे दलों का वोट शेयर जोड़ दें तो यह आंकड़ा भाजपा के मतों को पार कर जाएगा।

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आंकड़ों पर गौर करें तो मात्र दो फीसदी की कमी से साढ़े तीन दर्जन से ज्‍यादा सीटें हार सकती है। भाजपा के साथ दिक्‍कत यह है कि उसको सरकार विरोधी मतों का भी सामना करना पड़ेगा। भाजपा के दर्जनों सांसदों से उनके क्षेत्र की जनता नाराज है। इसलिए उन सीटों पर भी भगवा दल को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। 2019 में भाजपा को संयुक्‍त विपक्ष के साथ अपने सांसदों के काम और कार्यकर्ताओं की नाराजगी का भी सामना करना पड़ेगा।

उत्‍तर प्रदेश में 2014 में अपना दल के साथ मिलकर 80 में से 73 सीटों पर कब्‍जा जमाया था, लेकिन इस बार यह राह आसान नजर नहीं आ रही है। इसका सबसे बड़ा कारण केंद्र सरकार का अपने वादो पर खरा नहीं उतर पाना है। जनता नरेंद्र मोदी पर लगातार भरोसा करती रही, लेकिन सरकार की तरफ से उसे कोई ऐसी राहत नहीं मिली, जिससे वह भाजपा के साथ खड़ा रह सके। रही सही कसर पेट्रोल-डीजल की कीमतों ने पूरा कर दिया है। कैराना-नूरपुर की हार के बाद यह मुश्किल और बढ़ जाएगी।