…तो क्‍या मोदीजी के खिलाफ बात रखने वाले मजबूत विपक्षी नेता का अभाव है?

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बृजेंद्र दुबे

: मोदी जी के मुकाबिल कोई नेता है क्या? : बचपन में ‘ समुद्र मंथन से पहले हलाहल फिर अमृत निकलता है’ वाली कहानी बहुत लुभाती थी. मैं अक्सर अपनी मां से यह कहानी जिद करके कई बार सुनता था. कुछ होश संभालने पर मैंने अखबारों की सुर्खियां और कुछ रुचि होने के कारण इतिहास में खास तौर पर क्रांतिकारी घटनाएं कई-कई बार पढ़ीं.

भारत का स्वतंत्रता संग्राम हो या अमेरिका का, फ्रांस की क्रांति हो या रूस की बोल्शेविक क्रांति. 1857 की गदर हो या फिर ईसाई धर्म का सुधार आंदोलन प्रोटेस्टेंट मूवमेंट. इन सब घटनाओं में एक बात मैंने अपनी सामान्य समझ से यह निकाली कि तत्कालीन परिस्थितियों से उपजे विद्रोह के बीच से एक शख्स मशाल लेकर निकलता है और एक बड़ी युगान्तकारी घटना का वह नेतृत्वकर्ता बनता है. चाहे महात्मा गांधी हों या मार्टिन लूथर किंग. रूस की क्रांति के बीच लेनिन का जन्म हुआ… जैसे फ्रांस में नेपोलियन बोनापार्ट का.

नायक गढ़ने की परंपरा बहुत पुरानी है. अपने देश में भी ऐसा समय-समय पर होता रहा है. अटल जी का दौर समाप्त होने के बाद 2004 से 2014 तक के समय में मनमोहन सिंह का पहला कार्यकाल हमेशा याद रखा जायेगा. उस दौर में देश ने तमाम ऊंचाइयां छुईं. मनरेगा से लेकर आधार तक की नींव पड़ी.. जिसे मोदी सरकार भी आगे बढ़ा रही है. मनमोहन का दूसरा कार्यकाल 2009 से 2014 तक का दौर देश में अस्थिरता, घोटाले और नये नायकों के उदय का काल रहा. अन्ना हजारे, अरविंद केजरीवाल की बात छोड़िए… आज देश के प्रधानमंत्री पद पर विराजमान नरेंद्र मोदी जी भी इसी काल की उपज हैं.

2014 से लेकर अब तक मोदी जी के काल में भी कई लोग नायकत्व की ओर बढ़े, लेकिन बहुत जल्दी बत्ती गुल हो गयी. इस कड़ी में कभी कन्हैया कुमार आये, कभी उमर खालिद, कभी रोहित वेमुला, कभी रवीश कुमार, कभी अखिलेश यादव… आदि-आदि. सूची काफी लंबी हो जायेगी. ये सारे उभरने वाले नाम पानी के बुलबुले की तरह ही रहे. हाल के वर्षों में मोदी जी के समतुल्य उभरा सबसे बड़ा नाम नीतीश कुमार जी का था, लेकिन दूरदर्शी नीतीश जी ने खुद अपने को उस रेस से अलग कर लिया और आज भाजपा के साथ बिहार के सीएम पद पर आसीन हैं.

बिहार में महागठबंधन टूटने के बाद राजद सुप्रीमो के सुपुत्र तेजस्वी यादव का विधानसभा में दिया गया भाषण काफी समय तक मोदी विरोधियों की जुबान पर रहा. बहुत लोगों ने कहा कि तेजस्वी में बहुत स्पॉर्क है और ये लड़का बिहार का सीएम तो बनेगा ही… समय और परिस्थितियों ने साथ दिया तो और आगे बढ़ेगा. और आगे कहां तक बढ़ेगा, इस सवाल पर लोग चुप अब भी चुप हैं.

कुल मिला कर मेरा ये कहना है कि जिस तरह सीता के स्वयंवर में शिव का धनुष जब नहीं उठा सका कोई, तो महाराजा जनक फूट पड़े थे.. क्या ये धरती योद्धाओं-क्षत्रियों से खाली हो चुकी है…..? और तब ऋषि विश्वामित्र की आज्ञा से भगवान राम उठ खड़े हुए और धनुष तोड़ कर सीता का वरण किया था.

तो क्या मित्रो, इसे सच मान लिया जाए… या आनेवाले समय में देश में कोई एक सर्वमान्य नेता उभर कर सामने आयेगा और मोदी जी को 2019 में कड़ी टक्कर देगा….? अब भी ले-देकर राहुल गांधी ही सबसे आगे हैं. हालांकि राहुल मोदी के सामने कहीं भी टिक नहीं पा रहे. मेरी एक बड़ी चिंता है.  मोदी जी को कोई टक्कर दे पाये या न दे पाये. लेकिन लोकतंत्र की रक्षा के लिए देश में एक मजबूत विपक्ष की जरूरत भी नहीं पूरी हो पा रही है. जो बहुत ही दुखद है… ये शुभ संकेत नहीं हैं.

कहते हैं कि देश की आजादी के ठीक बाद नेहरू जी के काल में भी यही हाल था. विपक्ष नाम की कोई चीज ही नहीं थी… सब तरफ कांग्रेस ही कांग्रेस. लेकिन नेहरू जी के कालखंड में कांग्रेस में ही ऐसे बहुत सारे नेता थे, जो अपनी ही सरकार की बखिया संसद से लेकर सड़क तक उधेड़ देते थे… और नेहरू जी उन्हें पार्टी से बाहर करने की बजाय गलती सुधारते थे.

बताया जाता है कि नेहरू जी जेपी-लोहिया और श्यामाप्रसाद जी का बेहद सम्मान करते थे. यही नहीं नेहरू के समय में अखबारों में खिलाफ एडिट लिखने पर मुख्यमंत्री बदल जाते थे. यूपी में ऐसे कई उदाहरण हैं… मेरे अग्रज पत्रकार वहां के पॉयोनियर और नेशनल हेराल्ड के संपादकों क्रमश: के रामाराव और एम चलपति राव के एडिट को आज भी याद करते हैं. उनके एडिट पर सरकारें हिल जाती थीं.

आज नरेंद्र मोदी जी के समय में मीडिया या भाजपा से उम्मीद करना ही बेमानी है कि कोई सरकार के खिलाफ मुंह खोलेगा….तो क्या इस समय भारत की धरती पर मोदी जी के खिलाफ मजबूती से अपनी बात रखनेवाले विपक्षी नेता का सर्वथा अकाल है?

वरिष्‍ठ पत्रकार बृजेंद्र दुबे के एफबी वाल से साभार. श्री दुबे लंबे समय तक प्रभात खबर के संपादक रहे हैं. यूपी के रहने वाले श्री दुबे इसके अलावा भी कई अख्‍बारों में वरिष्‍ठ पदों पर रहे हैं.