जब यादों ने कुंवर को निकाल लिया अंधेरों के झरोखे से  

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विजय पांडेय

: जिंदगी अनुभवों से प्रेरित है सीपी की किताब : जिंदगी को समझने-बूझने का हर किसी का अपना अलग-अलग नजरिया होता है। किसी के लिए जिंदगी नदी की बहती रवानी है तो किसी के लिए तालाब का ठहरा पानी। जिंदगी हर किसी का अलग-अलग तरीके से इम्तिहान लेती है। हर कोई अपनी जिंदगी के अलग-अलग पैमाने सेट करता है, लेकिन जीवन के उतार-चढ़़ाव के बीच सफल वही होता है, जो लगातार चलने और चलते रहने में विश्‍वास रखता है। चरैवेति चरैवेति।

जिंदगी के इस सफर में कई अपने छूटते हैं। बिछड़ते हैं। कुछ बदल जाते हैं तो कुछ नए यार मिलते हैं। कुछ जुड़ते हैं तो कुछ टूट जाते हैं। जिंदगी ऐसे ही उबड़-खाबड़ राहों से होकर चलती रहती है। मेरे कहने का आशय केवल इतना है कि हर किसी की जिंदगी अपने आप में एक किताब है, जिसमें तमाम अनुभव और सीख शामिल रहते हैं। हर कोई अपनी जिंदगी के बीते पलों को कलमबद्ध कर दे तो वह एक बेहतरीन किताब बन सकती है, जिसमें सुख, दुख, ड्रामा, इमोशन, सीख, अनुभव जैसी बहुत चीजें समाहित होंगी।

ठीक ऐसा ही प्रयास कभी सहकर्मी रहे पत्रकार कुंवर सीपी सिंह ने किया है। कुंवर ने अपनी जिंदगी के तमाम छुए-अनछुए पहलुओं को कलमबद्ध करने का प्रयास किया है। बात उन दिनों की है, जब कुंवर एक सफल पत्रकार बनने और अपनी किस्‍मत आजमाने के लिए जौनपुर से दिल्ली के लिए निकले। पत्रकारिता के पेशे में कुंवर अभी सफलता के सोपान छूने की तैयारी ही कर रहे थे कि उनकी निजी जिंदगी के उतार-चढ़ाव ने उन्‍हें काफी पीछे ढकेल दिया।

बाप के साया से महरूम कुंवर को निजी जिंदगी में मिली असफलताओं ने उसको भीतर तक बेध डाला। कुछ बनने का सपना दम तोड़ने लगा। उम्‍मीदें मयखानों की दहलीज पर हर शाम लड़खड़ाने लगीं। रिश्‍ते सिगरेट के धुंओं की मानिंद हवा में उड़कर ओझल होने लगे। ऐसा भी दौर आया जब कुंवर ने जिंदगी की रफ्तार एक झटके में रोक देने के बारे में सोचने लगा। वैसे भी, मध्यम वर्ग का व्यक्ति जब अपनी निजी जीवन की समस्या में उलझता है तो फिर उलझता ही चला जाता है, कुछ ऐसा ही कुंवर के साथ भी हुआ।

कहावत है कि न सफलता के कई रिश्तेदार होते हैं और असफलता के सिर्फ दोस्त। कुंवर के तो अब दोस्‍त भी कम होने लगे थे। कुंवर नितांत अकेलेपन की ओर बढ़ने लगा था। उसे अंधेरे से प्‍यार होने लगा था, लेकिन अचानक कुछ पुरानी यादों ने उसकी आंखों में चमक बिखेर दी। अब वह अंधेरे से निकलकर उजाले की तरफ बढ़ने की सोचने लगा। जब कुंवर की सोच बदली तो रास्‍ते भी बनने लगे। उम्‍मीदें भी जगने लगीं। अभी बदलाव का आगाज है, अंजाम समय को तय करना है।

कुंवर कहते हैं कि जैसे रंगीन फोटो को साफ होने के लिए अंधेरे से होकर गुजरना पड़ता है, वैसे ही शायद मैं अंधेरे से गुजर चुका हूं। अब बस रंगीन फोटो बाहर आना शेष रह गया है। कुंवर कहते हैं कि अंधेरे के दौर में उनके पास केवल यादें थीं, जिसके सहारे वह इस रोशनी में आने में सफल रहे। कुंवर अपनी इन्‍हीं यादों, इरादों, सपनों, उम्‍मीदों को जोड़कर एक किताब का रूप दे रहे हैं। राष्‍ट्र खबर न्‍यूज चैनल की जिम्‍मेदारियों को साथ वह अपनी आने वाली किताब ‘झरोखा यादों का’ के जरिए अपने कई छुए-अनछुए पहलुओं को सबके सामने रखने का प्रयास किया है। हमारी शुभकामनाएं।vijay

लेखक विजय पांडेय शानदार व्‍यक्तित्‍व के धनी हैं. टीवी पत्रकारिता, रंगमंच से लगायत फिल्‍म इंडस्‍ट्री में अपनी धमक बनाए हुए हैं. हरिशंकर परसाई को हद से ज्‍यादा चाहने वाले श्री पांडेय अपने असली जीवन में भी कामिक टाइमिंग के लिए पहचाने जाते हैं. उनके तमाम लेख और रचनाएं कई जगहों पर प्रकाशित हो चुकी हैं.